विष्णु का मंदिर या शिव का ? जानें कश्मीर के 53 कक्षों वाले बुनीयार मंदिर का प्राचीन इतिहास

    24-अगस्त-2026
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History Of Buniyar Temple Kashmir Historical
 
मार्तंड सूर्य मंदिर की भव्यता, अवंतीस्वामी की विशाल योजना और पांद्रेथन की अलग स्थापत्य शैली के बाद कश्मीर के प्राचीन मंदिरों की हमारी यात्रा अब बुनीयार पहुंचती है। बारामुला-उरी मार्ग पर झेलम यानि प्राचीन वितस्ता के किनारे स्थित बुनीयार मंदिर कश्मीर की प्राचीन मंदिर वास्तुकला का एक खास उदाहरण है। सड़क से गुजरते हुए आज भी इसकी पत्थर की संरचना और छत का हिस्सा दिखाई देता है।
 
 
लेकिन बुनीयार की खासियत सिर्फ इसका मुख्य मंदिर नहीं है। कभी इसके चारों ओर 145 फीट लंबा और करीब 119.5 फीट चौड़ा एक विशाल परिसर था, जिसमें 53 छोटे कक्ष बने हुए थे। इन कक्षों के आगे स्तंभों वाली एक लंबी परिक्रमा-पंक्ति थी।
  
 
मंदिर के इतिहास की एक और दिलचस्प परत इसकी धार्मिक पहचान से जुड़ी है। आज मंदिर में आपको शिवलिंग दिखाई देते हैं, लेकिन R. C. Kak के अध्ययन के अनुसार मंदिर के गर्भगृह में मूल रूप से विष्णु की प्रतिमा होने की बात सामने आती है। बाद में वहां शिवलिंग स्थापित किए गए। मंदिर कब बना और यह बदलाव कब हुआ, इसका कोई निश्चित प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है।

Buniyar Temple Kashmir Srinagar1868 में फोटोग्राफर John Burke द्वारा ली गई तस्वीर 
 
 
पांडवों से जुड़ी स्थानीय मान्यता
 
 
बुनीयार को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की मान्यताएं भी रही हैं। 19वीं शताब्दी में जब अंग्रेज यात्रियों और पुरातत्वविदों ने इस मंदिर को देखा, तब भी उन्हें इससे जुड़ी ऐसी स्थानीय परंपराओं के बारे में बताया गया था।
 
 
H. H. Cole जब 1868 में फोटोग्राफर John Burke के साथ बुनीयार पहुंचे, तब मंदिर में रहने वाले एक स्थानीय पंडित ने उन्हें बताया कि मंदिर का निर्माण “पांडव” ने कराया था। इससे पहले Karl Alexander von Hügel ने 1835 के आसपास इसे देखा था और इसे बौद्ध मंदिर समझ लिया था। 
 
 
कुछ वर्षों बाद G. T. Vigne ने इसे हिंदू मंदिर के खंडहर के रूप में दर्ज किया। इन स्थानीय मान्यताओं को इतिहास का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन ये जरूर बताती हैं कि 19वीं शताब्दी तक भी बुनीयार को लेकर स्थानीय समाज में अलग-अलग परंपराएं मौजूद थीं।
 
 
मिट्टी और जंगल में दबा था मंदिर
 
 
19वीं शताब्दी के शुरुआती यात्रियों ने मंदिर को जिस हालत में देखा, वह आज की स्थिति से काफी अलग थी। मंदिर का बड़ा हिस्सा मिट्टी, पेड़ों और झाड़ियों से ढका हुआ था।
 
 
Alexander Cunningham ने नवंबर 1847 में यहां पहुंचकर मंदिर का निरीक्षण करने की कोशिश की। उस समय मंदिर का काफी हिस्सा बर्फ जंगलों के बीच छिपा हुआ था। उन्होंने दूर से देखने के लिए दूरबीन तक का इस्तेमाल किया था। बाद में महाराजा रणबीर सिंह के आदेश पर मंदिर परिसर की खुदाई कराई गई।
 
 
इसके बाद इसकी वास्तविक संरचना काफी हद तक सामने आई। यही खुदाई बुनीयार के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण साबित हुई, क्योंकि इससे पता चला कि यहां केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि उसके चारों ओर एक बड़ा और योजनाबद्ध परिसर बना हुआ था।

buniyar temple history RC Kak Book  
 RC काक की किताब Ancient Monuments of Kashmir में बुनियर मंदिर का उल्लेख 
 
 
19वीं सदी में दर्ज हुआ बुनीयार का इतिहास
 
 
1847 में Cunningham के निरीक्षण के बाद W. G. Cowie ने 1865 में मंदिर का अधिक विस्तृत अध्ययन किया। उनका विवरण ‘Notes on Some of the Temples of Kashmir’ में प्रकाशित हुआ।
 
 
Cowie ने मंदिर के परिसर, स्तंभों, पत्थरों और आसपास की संरचनाओं का विवरण दिया। स्थानीय पंडितों ने उन्हें बताया कि मंदिर का निर्माण “Bonadutt” नामक व्यक्ति ने कराया था। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं मिलती।
 
 
Cowie ने मंदिर में इस्तेमाल किए गए पत्थरों पर भी ध्यान दिया। उनके अनुसार यहां इस्तेमाल हुआ पत्थर हल्के रंग का मोटा ग्रेनाइट था। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कश्मीर के ज्यादातर प्राचीन मंदिरों में अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल मिलता है। बुनीयार और वांगथ के मंदिरों में ग्रेनाइट के इस्तेमाल का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। 1869 में H. H. Cole की Illustrations of Ancient Buildings in Kashmir में भी बुनीयार मंदिर का विवरण और चित्र प्रकाशित हुए।
 
Buniyar Temple Kashmir Srinagar W. G. Cowie की 1865 की पुस्तक ‘नोट्स ऑन सम ऑफ द टेंपल्स ऑफ कश्मीर’ से स्तंभयुक्त गलियारे का रेखाचित्र
 
 
मंदिर कितना पुराना है?
 
 
बुनीयार की निश्चित निर्माण-तिथि आज भी स्पष्ट नहीं है। मंदिर पर ऐसा कोई प्रमाणित निर्माण-शिलालेख नहीं मिला है, जिससे इसका निर्माण-वर्ष या निर्माता निश्चित रूप से बताया जा सके। कल्हण की राजतरंगिणी में भी बुनीयार का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसी वजह से अलग-अलग विद्वानों ने इसकी तारीख अलग-अलग मानी है।
 
 
पुराने अध्ययनों में इसे 5वीं–6वीं शताब्दी तक रखने के मत मिलते हैं। D. R. Sahni ने भी इसे लगभग 6वीं शताब्दी के आसपास रखने का मत दिया था।
 
 
बाद में कला इतिहासकार S. Goetz ने स्थापत्य के आधार पर इसे लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी का माना। आधुनिक ASI inventory भी इसे लगभग 8वीं शताब्दी का मंदिर बताती है।
 
 
इसलिए बुनीयार को किसी एक राजा से जोड़ना या इसका बिल्कुल निश्चित निर्माण-वर्ष बताना उचित नहीं होगा। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे लगभग 8वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर कहना अधिक सुरक्षित है।
 
 
विष्णु का मंदिर या शिव का?
 
 
बुनीयार से जुड़ा सबसे दिलचस्प सवाल इसकी मूल धार्मिक पहचान को लेकर है। आज यहां शिवलिंग दिखाई देते हैं और मंदिर को शिव मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। लेकिन R. C. Kak ने Ancient Monuments of Kashmir में गर्भगृह के प्रतिमा-आसन का अध्ययन करते हुए लिखा कि 'वहां स्थापित मूल प्रतिमा विष्णु की प्रतीत होती थी।'
 

buniyar temple history RC Kak Book RC काक की किताब 'Ancient Monuments of Kashmir'
  
 
Kak के अनुसार बाद के समय में वहां छोटे शिवलिंग स्थापित किए गए। उनका विवरण पुस्तक के पृष्ठ 156-159 में मिलता है। यहां एक और दिलचस्प बात है। Kak ने लिखा कि मंदिर में मौजूद शिवलिंग नर्मदा नदी के तल से लाए गए थे। हालांकि इस जानकारी को उनके समय के विवरण के रूप में ही देखना उचित होगा।
 
 
ASI की Monument inventory भी बुनीयार को विष्णु को समर्पित मंदिर के रूप में दर्ज करती है।
  
 
इन स्रोतों को देखते हुए यह संभावना मजबूत होती है कि मंदिर का मूल स्वरूप वैष्णव रहा होगा और बाद में यहां शिव पूजा स्थापित हुई। लेकिन यह बदलाव कब हुआ और इसके पीछे क्या कारण थे, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए इसे सीधे-सीधे “पहले विष्णु मंदिर, फिर शिव मंदिर” कहना इतिहास से ज्यादा निश्चित दावा होगा।

Buniyar Temple Kashmir Srinagar 
 
53 कक्षों वाला विशाल परिसर
 
 
बुनीयार की सबसे खास बात उसका विशाल चौकोर परिसर है। R. C. Kak के अनुसार यह परिसर करीब 145 फीट × 119.5 फीट का था और इसमें 53 कक्ष तथा एक मुख्य प्रवेश द्वार था। प्रत्येक कक्ष आकार में छोटा और आयताकार था। इनके सामने स्तंभों वाली एक लंबी परिक्रमा-पंक्ति बनी थी। हर कक्ष के प्रवेश पर त्रिफलाकार मेहराब और उसके ऊपर ऊंचा पेडिमेंट बनाया गया था। परिसर के बीचोंबीच मुख्य मंदिर खड़ा था।
 
 
इन 53 कक्षों का इस्तेमाल किस काम के लिए होता था, इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। इसलिए उन्हें सीधे “मठ के कमरे” कहना उचित नहीं होगा। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में कक्ष और उनके आगे बनी स्तंभयुक्त संरचना यह जरूर बताती है कि बुनीयार केवल एक छोटा पूजा स्थल नहीं था। इसे एक बड़े धार्मिक परिसर के रूप में योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया था।

Buniyar Temple Kashmir Srinagar 
बुनीयार क्यों महत्वपूर्ण है?
 
 
बुनीयार की अहमियत सिर्फ इसकी उम्र में नहीं है। एक तरफ यहां कश्मीर की प्राचीन मंदिर वास्तुकला की कई खास विशेषताएं दिखाई देती हैं। दूसरी तरफ इसके चारों ओर बना 53 कक्षों वाला विशाल परिसर इसे दूसरे कई मंदिरों से अलग करता है।
 
 
इसके इतिहास में कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं-19वीं शताब्दी के यात्रियों के विवरण, महाराजा रणबीर सिंह के समय हुई खुदाई, बाद के पुरातात्त्विक अध्ययन, मंदिर की संभावित वैष्णव पहचान और वर्तमान में दिखाई देने वाली शिव पूजा।
 
 
बुनीयार की कहानी इसलिए किसी एक राजा या एक तारीख तक सीमित नहीं है। यहां उपलब्ध स्थापत्य प्रमाण हमें कश्मीर की उस मंदिर परंपरा की झलक देते हैं जिसमें मुख्य मंदिर के साथ पूरा परिसर, स्तंभ, छोटे कक्ष और जल निकासी जैसी व्यवस्थाएं भी योजना का हिस्सा थीं।
 
 
बुनीयार आज भी कश्मीर के प्राचीन मंदिर स्थापत्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके पत्थर बहुत कुछ बताते हैं, लेकिन इसके इतिहास से जुड़े कुछ सवाल अब भी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं। शायद यही वजह है कि बुनीयार केवल एक पुराना मंदिर नहीं, बल्कि कश्मीर के अतीत को समझने वाली एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जगह है।
 
 
Written By 
Ujjawal Mishra (Arnav)