वंधामा नरसंहार: 28 साल बाद SIA की ताबड़तोड़ रेड, खुलेगा 23 कश्मीरी हिंदुओं की हत्या का राज?
25-अगस्त-2026
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सरला भट्ट और सर्वानंद कौल प्रेमी जैसे चर्चित कश्मीरी हिंदू टारगेटेड किलिंग केस फिर से खुलने के बाद, अब बारी है वंधामा नरसंहार केस के पीड़ितों को न्याय मिलने की.
28 साल पहले आतंकियों ने गांदरबल जिले में के वंधामा गांव में 23 हिंदुओं को गोलियों से छलनी कर दिया था. अब मामले में SIA की टीम ने कश्मीर में कई जगह रेड की है.
क्या है वंधामा नरसंहार केस ?
बात है 25 जनवरी 1998 की, देश 49वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी कर रहा था. शब-ए-कद्र की रात थी, मस्जिदों पर तेज आवाज में लाउड-स्पीकर बजाए जा रहे थे.
श्रीनगर से करीब 21 किलोमीटर की दूरी पर गांदरबल के एक छोटे से गांव 'वंधामा' में लोग सोने की तैयारी कर रहे थे. रात के करीब 10 बज रहे थे. घरों के दरवाजे बंद हो चुके थे. तभी करीब 20-21 आतंकियों का एक ग्रुप गांव में एंट्री करता है. किसी को शक ना होे, इसलिए सभी ने सेना की वर्दी पहनी थी.
दुश्मन भेड़िया इंसान की शक्ल में था. निशाना थे गांव के चार हिंदू परिवार, बता दें कि वंधामा में हिंदुओं के केवल चार ही घर थे.
सेना की वर्दी में आतंकी हिंदुओं के घरों का दरवाजा खटखटाते हैं. लोग बाहर आते हैं. इस पर आतंकी उनसे सामान्य बातचीत करते हैं, जैसे की सेना का कोई जवान करता. आतंकी ठंड का बहाना बनाकर उनसे चाय मांगते हैं, एक तो मेहमाननवाजी का स्वभाव और ऊपर से सेना के जवान, महिलाएं बिना किसी डर के चाय बनाने रसोई में चली जाती हैं. भोले भाले हिंदु उनकी असलियत भांपने में नाकाम होते हैं. वो बेफिक्र होते हैं और तभी घात लगाकर बैठे आतंकी मौका देखते ही ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर देते हैं. गोलियों की आवाज मस्जिदों में बज रहे लाउड स्पीकरों की तेज आवाज में दबकर रह जाती है.
एक के बाद एक चार परिवारों के 23 लोगों के शव जमीन पर पड़े होते हैं. 10 पुरूष, 9 महिलाएं और चार बच्चे. गांव से हिंदुओं का नामों-निशां मिटा दिया जाता है. इतना ही नहीं, इस कत्लेआम के बाद शवों को घरों के साथ ही आग के हवाले कर दिया जाता है. ताकि कोई सबूत भी न बचे. एक ही झटके में सब खत्म, केवल एक 14 साल के लड़के को छोड़कर, जो कि जैसे-तैसे भूसे में छिपकर खुद को बचाने में सफल रहता है. वो यह सारी बर्बरता अपनी आंखों से देखता है.
अगले दिन जब देश गणतंत्र दिवस मना रहा होता है, ये खबर पूरे देश को हिला कर रख देती है. लोकतांत्रिक देश में 23 हिंदुओं की इस तरह चुन कर बर्बर हत्या ! लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर होता है, जिसे देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल घटनास्थल पर पहुंचते हैं. जांच और न्याय का भरोसा दिया जाता है. जिसे कभी पूरा नहीं किया जाता.
क्लोजर रिपोर्ट से लेकर केस के फिर से खुलने तक
साल 2000 में सुरक्षा बल मुठभेड़ में इस नरसंहार के मास्टरमाइंड और हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर अब्दुल हामिद गडा को मार गिराते हैं. इसके आठ साल बाद साल 2008 में जम्मू कश्मीर पुलिस इस केस में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है. जिसमें कहा जाता है कि नरसंहार में शामिल सभी 21 आतंकवादी अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं.
और इस तरह 23 हिंदुओं की दर्दनाक हत्या की ये कहानी इतिहास बन जाती है. लेकिन 2019 में समय फिर करवट लेता है. अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद जम्मू कश्मीर में हालात तेजी से बदलते हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर 2024 में 90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं की टारगेटेड किलिंग्स के मामलों की समीक्षा शुरु की जाती है.
सरला भट्ट हत्याकांड केस की फाइल को फिर से खोला जाता है. जून 2026 में SIA इस केस में 737 पन्नों की एक चार्जशीट दाखिल करती है. जिसमें मास्टर माइंड के तौर पर आतंकी यासीन मलिक को नामजद आरोपी बनाया जाता है.
12 अगस्त 2026 को SIA 1990 के ही एक और चर्चित सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल के डबल मर्डर केस में 9 अलग-अलग ठिकानों पर रेड करती है. टीम कुछ अहम सबूत मिलने का दावा भी करती है. और अब इसके बाद 24 अगस्त 2026 को SIA की टीम वंधामा नरसंहार मामले को फिर से खोलती है. कश्मीर में कई जगह रेड की जाती है. दावा किया जाता है कि जीवित बचे कुछ संदिग्ध और आतंकवादियों के मददगारों को चिह्नित किया गया है.
और कौन-कौन से केस फिर से खोले ?
24 अगस्त को SIA वंधामा नरसंहार केस के साथ दो और चर्चित केसों की फाइल फिर से खोली जाती है. जो कि हैं, बीजेपी नेता टीकालाल टपलू और जस्टिस गंजू मर्डर केस . जिनकी हत्या क्रमश 14 सितंबर 1989 और 4 नवंबर 1989 को कर दी गई थी.
देर आए, दुरुस्त आए. 28 साल बाद इस केस का फिर से खुलना, आतंकवाद और अलगाववाद के पूरे इकोसिस्टम पर महज शिकंजा कसना भर नहीं है, बल्कि यह कश्मीरी हिंदुओं के उस विश्वास की जीत है जो उन्होंने देश के संविधान पर बनाए रखा. जम्मू कश्मीर नाऊ.