दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के पायर गांव में स्थित यह मंदिर पुलवामा से करीब 5 किलोमीटर दूर है। जबकि अवंतीपोरा रेलवे स्टेशन से करीब 10 किलोमीटर और श्रीनगर से इसकी दूरी करीब 34 किलोमीटर है। हालाँकि मंदिर की असली पहचान दूरी में नहीं, उन पत्थरों में छिपी है, जिन पर करीब एक हजार साल पुरानी स्थापत्य परंपरा की कहानी दर्ज है।
5वीं शताब्दी या 11वीं? पायर का इतिहास
पायर मंदिर में ऐसा कोई स्पष्ट शिलालेख नहीं मिला है, जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि इसे किस राजा ने और किस वर्ष बनवाया था। इसी वजह से इसके निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहा है।
19वीं शताब्दी में कश्मीर के प्राचीन मंदिरों का अध्ययन करने वाले जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसे राजा नरेंद्रादित्य द्वारा लगभग 483–490 ईस्वी में बनवाए गए नरेंद्रस्वामी मंदिर से जोड़ा। लेकिन बाद के अध्ययनों में इस पहचान पर भी सवाल उठे।
प्रसिद्ध इतिहासकार आर.सी. काक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Ancient Monuments of Kashmir’ के पृष्ठ 126-128 तक में विस्तार से लिखा है। आर.सी. काक अपनी किताब में कनिंघम के इस मत का उल्लेख करते हुए असहमति जताते हैं। उनका तर्क था कि मंदिर की स्थापत्य शैली इसे लगभग 11वीं शताब्दी के आसपास रखने की ओर संकेत करती है। साथ ही मंदिर शिव को समर्पित है, जबकि नरेंद्रस्वामी नाम विष्णु से जुड़ी पहचान की ओर संकेत करता है।
‘Ancient Monuments of Kashmir’ - पृष्ठ 116
काक ने पायर के नाम को लेकर भी एक दिलचस्प जानकारी दी। वे लिखते हैं - “Payach” नाम का इस्तेमाल बाद के विवरणों में G.T. Vigne और Cunningham के जरिए प्रचलित हुआ, जबकि स्थानीय तौर पर यह नाम प्रचलित नहीं था।‘’
इसलिए पायर की कहानी में एक दिलचस्प विरोधाभास है मंदिर सामने है, उसकी मूर्तियां सामने हैं, स्थापत्य सामने है, लेकिन उसका सटीक निर्माण काल आज भी इतिहास का सवाल बना हुआ है।
छोटा मंदिर, लेकिन कारीगरी बेहद खास
पायर मंदिर आकार में वाकई छोटा है। आर.सी. काक के अनुसार ‘’मंदिर के अन्दर का हिस्सा करीब 8 फीट वर्गाकार है और आधार समेत इसकी ऊंचाई लगभग 21 फीट है। इसके बावजूद इसकी बनावट में वह बारीकी दिखाई देती है जो बड़े मंदिरों में देखने को मिलती है।‘’
काक ने Ancient Monuments of Kashmir के पृष्ठ 16 में ही मंदिर का वर्णन करते हुए लिखा है - “The Best Preserved Example of a Mediaeval Kashmiri Shrine” यानी उनके शब्दों में यह मध्यकालीन कश्मीरी मंदिरों का सबसे अच्छी तरह संरक्षित उदाहरण था।
मंदिर का गर्भगृह चारों ओर से खुला है, लेकिन पूर्व दिशा में बनी सीढ़ियों से प्रवेश किया जाता है। चारों तरफ के द्वारों के ऊपर त्रिफलकीय यानी Trefoil Arches हैं और इनके ऊपर अलंकृत शीर्ष बने हैं। मंदिर के स्तंभों पर हंसों के जोड़े और बैठे हुए बैलों (नंदी) की आकृतियां भी दिखाई देती हैं। यानी पहली नजर में छोटा दिखाई देने वाला यह मंदिर जितना करीब से देखा जाए, उतनी ही नई बारीकी सामने आती जाती है।
चार दिशाएं, शिव के अलग-अलग रूप
पायर मंदिर की सबसे बड़ी खूबी इसकी मूर्तिकला है। इसकी चारों दिशाओं में बने Reliefs में शिव की अलग-अलग छवियां दिखाई देती हैं।
पूर्व दिशा के Relief में शिव को सिंहासन पर बैठे हुए दिखाया गया है।
पश्चिमी दीवार का दृश्य शायद सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। यहां छह भुजाओं वाले शिव के नटराज रूप को नृत्य करते हुए दिखाया गया है। उनके हाथों में अलग-अलग वस्तुएं हैं, एक में त्रिशूल और दूसरे में फूल। ऊपर उठे हाथों में वस्त्र का सिरा है। इस दृश्य के साथ एक संगीतकार वीणा बजाता और दूसरा ढोल बजाता दिखाई देता है।
उत्तर दिशा में शिव का उग्र रूप भैरव दिखाई देता है। काक के विवरण के अनुसार भैरव एक मनुष्य का पीछा करते हुए दिखाए गए हैं और पीछे हाथी की सूंड जैसी आकृति भी दिखाई देती है।
दक्षिणी Relief में तीन मुखों वाले शिव पद्मासन में बैठे हैं। पास में एक स्त्री आकृति है, जिसे काक ने संभवतः माता पार्वती माना है। आसपास तपस्वियों जैसी आकृतियां और शिव के ऊपर उड़ती हुई आकृति भी दिखाई देती है।
यानी पायर की चार दीवारें सिर्फ मंदिर की वास्तु सीमा नहीं बनातीं। वे शिव के अलग-अलग रूपों को एक साथ सामने लाती हैं - शांत, उग्र, नृत्यमय और ध्यानमग्न।
हंस, नंदी और फूलों में छिपी कहानी
मंदिर की खूबसूरती सिर्फ शिव की आकृतियों तक सीमित नहीं है। द्वारों को संभालने वाले हिस्सों पर हंसों के जोड़े उकेरे गए हैं। उनके लंबे, पत्तियों जैसे दिखाई देने वाले पंख और पूंछ पत्थर की नक्काशी को और आकर्षक बनाते हैं। दूसरी ओर कुछ Capitals पर नंदी की आकृतियां हैं। उनके कूबड़ पर बंधी पट्टी जैसी आकृति भी साफ दिखाई देती है। कोने के स्तंभों पर फूलों की नक्काशी इसकी सजावटी शैली को पूरा करती है। यही वजह है कि पायर को केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में देखना इसकी स्थापत्य खूबी को छोटा कर देना होगा। यह अपने समय के शिल्पकारों की कल्पना और पत्थर पर उनकी पकड़ का भी प्रमाण है।
‘Ancient Monuments of Kashmir’ : RC Kak
सिर्फ दस पत्थरों में बना ऊपरी ढांचा
अब आते हैं पायर मंदिर की उस खासियत पर, जो इसे और भी असाधारण बनाती है। आर.सी. काक के विवरण के मुताबिक मंदिर का ऊपरी ढांचा केवल दस पत्थरों से बना है। बाहर से इसकी छत पिरामिड जैसी दिखाई देती है और इसे एक सजावटी पट्टी दो हिस्सों में बांटती है।
अंदर पहुंचने पर दृश्य और दिलचस्प हो जाता है। छत भीतर से अर्धगोलाकार गुंबद का रूप लेती है। इसके केंद्र में खिला हुआ कमल बना है। आसपास की जगहों में पंख फैलाए हुए मानवाकार आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें काक ने संभवतः यक्ष माना। इतने छोटे मंदिर में पत्थरों को इस तरह जोड़कर छत तैयार करना अपने आप में उस दौर की स्थापत्य समझ का परिचय देता है।
पायर और पांद्रेथन का रिश्ता
यहीं हमारी कश्मीर मंदिर-श्रृंखला की पिछली कड़ी पांद्रेथन फिर पायर से जुड़ती है। आर.सी. काक के अनुसार पांद्रेथन मंदिर की छत पायर की छत की बड़े आकार में बनाई गई प्रतिकृति है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दोनों मंदिरों के बीच स्थापत्य शैली की समानता सामने आती है। आज उपलब्ध अन्य स्थापत्य अध्ययनों में भी पायर और पांद्रेथन को कश्मीरी मंदिर वास्तुकला के महत्वपूर्ण बचे हुए उदाहरणों के रूप में साथ देखा जाता है।
इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि दोनों मंदिर एक ही समय या एक ही वास्तुकार ने बनाए हों। लेकिन उनकी छतों और योजना में दिखाई देने वाली समानता यह जरूर बताती है कि कश्मीर के मंदिर वास्तुकार कुछ स्थापत्य रूपों को विकसित करते हुए आगे ले जा रहे थे।
Archaeological Survey of India, Inventory of Monuments and Sites of National Importance-Srinagar Circle, 1998.
पायर मंदिर आज क्यों महत्वपूर्ण है?
पायर का महत्व उसकी ऊंचाई या विशाल परिसर में नहीं है। इसकी असली ताकत उस छोटे से पत्थर के ढांचे में है, जिसमें शिव की अनेक आकृतियां, हंस, बैल, फूल, त्रिफलकीय मेहराब और अनोखी छत सब एक साथ दिखाई देते हैं।
कश्मीर के मंदिरों की इस यात्रा में मार्तंड अपनी भव्यता से चौंकाता है, अवंतीस्वामी अपने विशाल परिसर से प्रभावित करता है और पांद्रेथन अपनी अनूठी संरचना से। पायर की खूबी इसके उलट है - यह छोटा है, लेकिन इसकी हर दीवार कुछ कहती है।
और शायद यही वजह है कि पायर को समझना केवल एक पुराने मंदिर को जानना नहीं है। यह उस कश्मीर को समझने की कोशिश भी है, जहां पत्थर केवल इमारत बनाने का माध्यम नहीं था, बल्कि कहानी कहने का जरिया भी था।
पायर जरूर जाएं..
अगर आप दक्षिण कश्मीर की यात्रा पर हैं और इतिहास तथा स्थापत्य में रुचि रखते हैं, तो पायर को अपनी यात्रा में जरूर शामिल किया जा सकता है। पुलवामा और अवंतीपोरा के आसपास के ऐतिहासिक स्थलों के साथ यह छोटा-सा मंदिर आपकी यात्रा को एक अलग अनुभव दे सकता है।
लेकिन जब भी यहां जाएं, इसे सिर्फ तस्वीर खींचने की जगह न समझें। इन पत्थरों पर बनी हर आकृति कई सदियों की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। मंदिर की दीवारों, नक्काशी और आसपास के परिसर को नुकसान न पहुंचाना और पुरातात्विक संरचना का सम्मान करना हर आगंतुक की जिम्मेदारी है। कश्मीर की यह विरासत केवल इतिहास की किताबों में दर्ज नाम नहीं है। इसे बचाकर रखना आने वाली पीढ़ियों को वह कश्मीर दिखाने की जिम्मेदारी है, जिसे आज हम इन पत्थरों के जरिए देख पा रहे हैं।