महात्मा गांधी और ‘वंदे मातरम्’: राष्ट्रभावना से वर्तमान राजनीतिक विवाद तक

वंदे मातरम् का सम्मान तभी पूर्ण होगा, जब भारत के प्रति हमारा प्रेम राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय कर्तव्य में परिवर्तित होगा।

    01-सितंबर-2026
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ललित कौशिक
 
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो केवल शब्द नहीं रहे, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए राष्ट्रभक्ति, त्याग और स्वाधीनता के मंत्र बन गए। ‘वंदे मातरम्’ ऐसा ही एक अमर राष्ट्रगीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय जनमानस में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जब देश इसके इतिहास और महत्व को याद कर रहा है, तब महात्मा गांधी के विचारों और वर्तमान राजनीतिक विवादों के संदर्भ में इसे समझना विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है।
 
महात्मा गांधी के लिए राष्ट्रभक्ति केवल नारों और प्रतीकों तक सीमित नहीं थी। उनका राष्ट्रवाद सत्य, अहिंसा, त्याग, सेवा और सर्वधर्म समभाव पर आधारित था। वे भारत को केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की साझा मातृभूमि के रूप में देखते थे। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ में व्यक्त मातृभूमि के प्रति श्रद्धा की भावना गांधी जी की राष्ट्रभक्ति के मूल विचारों से जुड़ती दिखाई देती है।
 
महात्मा गांधी स्वयं राष्ट्रीय एकता के प्रबल समर्थक थे। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य सभी समुदाय बराबरी के साथ रहें। इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण ‘वंदे मातरम्’ के कुछ अंशों को लेकर उठे धार्मिक प्रश्नों पर कांग्रेस के भीतर बहस हुई। 1937 में कांग्रेस ने सार्वजनिक अवसरों पर मुख्यतः पहले दो अंतरों के प्रयोग की व्यवस्था स्वीकार की। बाद के वर्षों में भी इस निर्णय को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।
 
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—किसी ऐतिहासिक निर्णय की आलोचना करना अलग बात है और किसी राष्ट्रगीत की भावना का अनादर करना अलग बात। ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की अमूल्य विरासत है। इसके साथ करोड़ों भारतीयों की भावनाएं और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान जुड़े हुए हैं।
 
कांग्रेस और वर्तमान ‘वंदे मातरम्’ विवाद
 
वर्ष 2026 में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर देश में राजनीतिक बहस तेज हुई। इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पूरे गीत के गायन को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक मतभेद सामने आए। अगस्त 2026 में कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान पूर्ण ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर विवाद पैदा हुआ। भाजपा ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने गीत के आगे के अंतरों के गायन को रोकने का संकेत किया। कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उनका इशारा मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने से संबंधित था। इसके बाद कांग्रेस की ओर से अपने पारंपरिक रुख—पहले दो अंतरों के गायन—का भी उल्लेख किया गया।
 
यहीं से सवाल उठता है कि जिस ‘वंदे मातरम्’ ने कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन को कभी ऊर्जा दी थी, उसी गीत को लेकर आज कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने क्यों हैं?
 
भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक कारणों से ‘वंदे मातरम्’ की मूल भावना को कमजोर किया और अब भी उसके पूर्ण स्वरूप को लेकर असहजता दिखाई देती है। दूसरी ओर कांग्रेस का तर्क है कि इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है और पहले दो अंतरों की परंपरा ऐतिहासिक एवं सर्वसम्मत निर्णयों से जुड़ी रही है। कांग्रेस नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि भाजपा राष्ट्रवाद के प्रतीकों के माध्यम से वास्तविक राजनीतिक मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है।
 
लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर इस पूरे विवाद को देखना आवश्यक है। ‘वंदे मातरम्’ किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की साझा विरासत है। जिस गीत को सुनकर हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष की प्रेरणा ली, उसे कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य दल के राजनीतिक चश्मे से देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा करता है।
 
महात्मा गांधी की दृष्टि से भी यही सबसे महत्वपूर्ण संदेश निकलता है। गांधी जी के लिए राष्ट्रभक्ति का अर्थ किसी व्यक्ति, पार्टी या सत्ता के प्रति निष्ठा नहीं था। राष्ट्रभक्ति का अर्थ था—भारत और भारतवासियों के प्रति निष्ठा। यदि ‘वंदे मातरम्’ भारतमाता को प्रणाम है, तो भारत के गरीब, किसान, मजदूर, सैनिक, युवा, महिला और अंतिम पंक्ति में खड़े नागरिक का सम्मान करना भी उसी प्रणाम का हिस्सा होना चाहिए।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘वंदे मातरम्’ को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय एकता और नागरिक कर्तव्य का प्रतीक बनाया जाए। यदि कोई दल इसे अपनी राजनीतिक श्रेष्ठता सिद्ध करने का माध्यम बनाता है या कोई दूसरा दल इसे केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर सीमित करता है, तो दोनों ही स्थितियों में इस गीत की व्यापक राष्ट्रीय भावना प्रभावित होती है।
 
गांधी जी हमें यह भी सिखाते हैं कि राष्ट्रप्रेम में असहमति के लिए भी स्थान होना चाहिए। किसी गीत के ऐतिहासिक, साहित्यिक या धार्मिक संदर्भ पर बहस हो सकती है, लेकिन बहस के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान और उससे जुड़ी करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का सम्मान बना रहना चाहिए।
 
आज भारत एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। युवा पीढ़ी के सामने विकसित और आत्मनिर्भर भारत बनाने की चुनौती है। ऐसे समय में ‘वंदे मातरम्’ का वास्तविक अर्थ केवल इसे गाना नहीं, बल्कि देश के लिए काम करना है। भ्रष्टाचार से लड़ना, ईमानदारी से अपना दायित्व निभाना, समाज में सद्भाव बनाए रखना, गरीब और वंचित व्यक्ति की सहायता करना तथा भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करना—ये सभी ‘वंदे मातरम्’ की भावना के आधुनिक रूप हैं।
 
अंततः ‘वंदे मातरम्’ को लेकर आज जो राजनीतिक विवाद चल रहा है, वह हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या राष्ट्र के प्रतीकों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखा जा सकता है?
 
महात्मा गांधी की विरासत का उत्तर स्पष्ट है। राष्ट्र सबसे ऊपर है और राजनीति राष्ट्रसेवा का माध्यम है। ‘वंदे मातरम्’ किसी दल का नारा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति और भारतमाता के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
 
इसलिए आज जब हम ‘वंदे मातरम्’ कहते हैं, तो हमें केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। हमें उन स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना चाहिए जिन्होंने इस भावना के लिए अपना जीवन समर्पित किया। हमें गांधी जी के उस भारत को याद करना चाहिए जिसमें राष्ट्रप्रेम के साथ मानवता, सहिष्णुता और सामाजिक समरसता भी हो।
 
वंदे मातरम् का सम्मान तभी पूर्ण होगा, जब भारत के प्रति हमारा प्रेम राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय कर्तव्य में परिवर्तित होगा।
 
वंदे मातरम्—मातृभूमि को नमन, स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का संकल्प।
संघर्ष का शक्तिशाली प्रतीक बन गया था। बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वदेशी आंदोलन तक इस गीत ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना पैदा की। कांग्रेस के अनेक अधिवेशनों और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में इसकी गूंज सुनाई देती थी। यह वह दौर था जब ‘वंदे मातरम्’ कहना अपने आप में अंग्रेजी शासन को चुनौती देने जैसा था।