
Delhi : बलूचिस्तान के क्वेटा में करीब 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने के दो दिन बाद अब पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने मंदिर को कट्टरपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। घटना पंजाब प्रांत के नारोवाल का है। मंदिर को गिराए जाने के पीछे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ (TLP) से जुड़े कट्टरपंथियों का हाथ बताया जा रहा है।
पंजाब के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित यह हिंदू मंदिर करीब 100 से 125 साल पुराना बताया जा रहा है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1,000 वर्ग मीटर में फैले इस मंदिर को 21 अगस्त को गिराए जाने की बात सामने आई है। स्थानीय लोगों और अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि मंदिर की जमीन को पास के मदरसे के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने के उद्देश्य से इसे जानबूझकर कट्टरपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया।
#PakistanNews : बलूचिस्तान में करीब 200 साल पुराने गुरुद्वारे को तोड़ने के बाद अब पंजाब में 100–125 साल पुराने हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया है। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि मंदिर की जमीन पर मदरसा बनाने के लिए उसे गिराया गया।#Pakistan #HinduTemple #TempleDemolition pic.twitter.com/GEZ7sMIYNo
— Jammu-Kashmir Now (@JammuKashmirNow) September 1, 2026
इस घटना से ठीक पहले बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में करीब 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने का मामला सामने आया था। ऐतिहासिक गुरुद्वारे की जमीन पर मॉल बनाने की तैयारी की जा रही है। 1947 में बंटवारे के बाद इस गुरुद्वारे के परिसर में लगभग 1953 से सेंट गैब्रिएल स्कूल संचालित होने लगा था।
पाकिस्तान में फिर निशाने पर अल्पसंख्यक समुदाय
— Jammu-Kashmir Now (@JammuKashmirNow) August 31, 2026
दुनियाभर में तथाकथित शांति का दूत बनकर घूमने वाले पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय लगातार निशाने पर है. अब बलूचिस्तान के क्वेटा में एक 200 साल पुराने गुरूद्वारे को शॉपिंग मॉल बनाने के लिए रातों-रात जमींदोज कर दिया गया है. pic.twitter.com/JFuGJgyoGv
धार्मिक आजादी के दावों पर सवाल
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार को अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी इस आदेश को जमीन पर लागू नहीं किया गया। नतीजा यह है कि अल्पसंख्यकों की धार्मिक विरासत लगातार असुरक्षित बनी हुई है। अब नारोवाल की ताजा घटना हो या बलूचिस्तान में 200 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे को विध्वंस का मामला, यह घटना पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करती है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है। लेकिन नारोवाल के मंदिर से लेकर क्वेटा के गुरुद्वारे तक सामने आ रहे मामले पूछ रहे हैं कि जिन मंदिरों और गुरुद्वारों की जिम्मेदारी पाकिस्तान के पास है, उनकी सुरक्षा आखिर कब सुनिश्चित होगी?