Pakistan : 200 साल पुराने गुरुद्वारे के बाद अब 125 साल पुराना मंदिर जमींदोज, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की धरोहरों पर संकट, क्यों चुप है दुनिया ?

पहले 200 साल पुराना गुरुद्वारा और अब 125 साल पुराना मंदिर, पाकिस्तान में चुन चुनकर क्यों मिटाए जा रहे धार्मिक स्थल ?

    01-सितंबर-2026
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Pakistan Hindu Temple Demolized
 
 
Written By : Ujjawal Mishra 

Delhi : बलूचिस्तान के क्वेटा में करीब 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने के दो दिन बाद अब पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने मंदिर को कट्टरपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। घटना पंजाब प्रांत के नारोवाल का है। मंदिर को गिराए जाने के पीछे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ (TLP) से जुड़े कट्टरपंथियों का हाथ बताया जा रहा है।  

पंजाब के नारोवाल जिले के सिराज गांव में स्थित यह हिंदू मंदिर करीब 100 से 125 साल पुराना बताया जा रहा है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1,000 वर्ग मीटर में फैले इस मंदिर को 21 अगस्त को गिराए जाने की बात सामने आई है। स्थानीय लोगों और अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि मंदिर की जमीन को पास के मदरसे के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने के उद्देश्य से इसे जानबूझकर कट्टरपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया।

 
 
दो दिन पहले 200 साल पुराने गुरुद्वारे पर चला बुलडोजर

इस घटना से ठीक पहले बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में करीब 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को गिराए जाने का मामला सामने आया था। ऐतिहासिक गुरुद्वारे की जमीन पर मॉल बनाने की तैयारी की जा रही है। 1947 में बंटवारे के बाद इस गुरुद्वारे के परिसर में लगभग 1953 से सेंट गैब्रिएल स्कूल संचालित होने लगा था।

 
 
पाकिस्तान का दावा और जमीन की हकीकत 
 
मई 2026 में पाकिस्तान सरकार ने फेक नैरेटिव चलाने के लिए कई शहरों के नाम बदलने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन कुछ ही दिनों में सरकार ने अपने इस फैसले से यू-टर्न ले लिया। अब सवाल यह है कि जब नामों में छिपी विरासत तक को सरकार स्थायी रूप से बचा नहीं पा रही, तो उन विरासतों की हकीकत क्या है जो जमीन पर मौजूद हैं? 
 
पाकिस्तान में कितने हिंदू-सिख धार्मिक स्थल बचे? 
 
दिसंबर 2025 में पाकिस्तान की माइनॉरिटी कॉकस की संसदीय समिति को पेश की गई एक रिपोर्ट में खुलासा था कि मुल्क में 1947 के दौरान कुल 1,817 हिंदू मंदिर और गुरुद्वारे मौजूद थे। जहां पूजा पाठ से लेकर धार्मिक गतिविधियाँ होती थीं। हालाँकि मौजूदा समय में 28 धार्मिक स्थल शेष बचे हैं। अन्य सभी मंदिर और गुरुद्वारा कट्टरपंथियों की हिंसा के भेंट चढ़ गए।इन धार्मिक स्थलों को या तो उपेक्षा के कारण खंडहर होने दिया गया या अवैध कब्जों और दंगों के दौरान तोड़ दिया गया।
 
इनमें 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद पाकिस्तान में हुए दंगों के दौरान क्षतिग्रस्त किए गए धार्मिक स्थल भी शामिल हैं। इनमें से सैंकड़ों ऐतिहासिक मंदिरों और गुरुद्वारों को सरकारी स्कूलों, मदरसों, होटलों, दुकानों और रेस्तरां में तब्दील कर दिया गया है। वहीं, एक आर्थिक जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में 6 लाख से अधिक मस्जिदें सक्रिय हैं। लेकिन हिन्दुओं से जुड़े धार्मिक स्थलों को पाकिस्तानी चुन चुनकर मिटाने में लगे हैं।

धार्मिक आजादी के दावों पर सवाल

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार को अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी इस आदेश को जमीन पर लागू नहीं किया गया। नतीजा यह है कि अल्पसंख्यकों की धार्मिक विरासत लगातार असुरक्षित बनी हुई है। अब नारोवाल की ताजा घटना हो या बलूचिस्तान में 200 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे को विध्वंस का मामला, यह घटना पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करती है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है। लेकिन नारोवाल के मंदिर से लेकर क्वेटा के गुरुद्वारे तक सामने आ रहे मामले पूछ रहे हैं कि जिन मंदिरों और गुरुद्वारों की जिम्मेदारी पाकिस्तान के पास है, उनकी सुरक्षा आखिर कब सुनिश्चित होगी?