लेख : उज्जवल मिश्रा
नई दिल्ली : समुद्र तल से करीब 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा भगवान शिव के प्रमुख तीर्थों में शामिल है। हर साल लाखों श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्गों की चढ़ाई कर यहां प्राकृतिक रूप से बनने वाले हिम शिवलिंग के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
प्राचीन कश्मीर के ग्रंथों से लेकर मध्यकालीन इतिहास और मुगलकालीन विवरणों तक, इस तीर्थ के अलग-अलग संदर्भ मिलते हैं। चलिए, इस लेख के माध्यम से जानते हैं अमरनाथ यात्रा का धार्मिक महत्व, इसके प्राचीन इतिहास और धार्मिक ग्रंथों में इसके उल्लेख से लेकर आज तक की इसकी पूरी यात्रा।
पौराणिक महत्त्व
अमरनाथ की धार्मिक परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती की अमरकथा से जुड़ी है। मान्यता है कि माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताने के लिए भगवान शिव ऐसी जगह गए, जहां कोई जीवित प्राणी उनकी बात न सुन सके।
कथा के अनुसार रास्ते में उन्होंने नंदी को पहलगाम, चंद्रमा को चंदनवाड़ी, नागों को शेषनाग और गणेश को महागुण पर्वत पर छोड़ दिया।
पंचतरणी में पंचतत्वों का त्याग करने के बाद वे गुफा में पहुंचे और माता पार्वती को अमरकथा सुनाई। इसी धार्मिक परंपरा के कारण गुफा में बनने वाले प्राकृतिक हिमलिंग को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड भी अपनी आधिकारिक जानकारी में इस कथा का उल्लेख करता है।
शेष नाग टॉप
नीलमत पुराण में ‘अमरेश’
अमरनाथ के प्राचीन इतिहास की तलाश में सबसे पहले कश्मीर के पुराने ग्रंथ सामने आते हैं। नीलमत पुराण के श्लोक 1372 में ‘अमरेश’ का उल्लेख मिलता है- “अमरेशे नरः स्नात्वा गोशतस्य फलं लभेत्।” अर्थात अमरेश में स्नान करने वाले व्यक्ति को सौ गायों के दान के बराबर पुण्य प्राप्त होने की बात कही गई है।
कल्हण की राजतरंगिणी
12वीं सदी के इतिहासकार कल्हण की राजतरंगिणी अमरनाथ की कहानी को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार देती है। राजतरंगिणी के प्रथम तरंग के श्लोक 267 में शेषनाग से जुड़े एक सरोवर का उल्लेख करते हुए अमरेश्वर की यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों का संदर्भ मिलता है। यानी कल्हण के समय तक अमरनाथ की तीर्थ यात्रा जारी थी।
यात्रा का इतिहास
अमरनाथ की यात्रा सबसे पहले किस व्यक्ति ने की, इसका निश्चित उत्तर इतिहास में नहीं मिलता। उपलब्ध सामग्री से इतना जरूर पता चलता है कि कल्हण के समय तक अमरेश्वर की यात्रा एक जानी-पहचानी तीर्थ परंपरा थी। वहीं धार्मिक मान्यता गुफा के प्रथम दर्शन को भृगु ऋषि से जोड़ती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, हिमालय की यात्रा पर आए भृगु ऋषि ने सबसे पहले अमरनाथ गुफा के दर्शन किए। धीरे-धीरे इसकी जानकारी आसपास के ग्रामीणों तक पहुंची और यहीं से इस दुर्गम गुफा की तीर्थ परंपरा आगे बढ़ी, जो आज लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है। इसके बाद यात्रा का यह सिलसिला आगे चलता रहा।
राजा संदिमत : कल्हण की राजतरंगिणी में राजा संदिमत को भगवान शिव का भक्त बताया गया है। कल्हण लिखते हैं कि राजा संदिमत भगवान शिव के बड़े भक्त थे, वे हिमालय में बसे अमरेश्वर स्थित हिम से निर्मित शिवलिंग की पूजा करते थे।
सुल्तान जैन-उल-आबिदीन: 15वीं सदी के इतिहासकार जोनराज के विवरण में कश्मीर के सुल्तान जैन-उल-आबिदीन की इस पवित्र स्थल से जुड़ी यात्रा का उल्लेख मिलता है।
‘आइन-ए-अकबरी’
अबुल फ़ज़ल: 16वीं सदी में मुगल बादशाह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में पेज नंबर 391 पर अमरनाथ गुफा का उल्लेख है। उन्होंने यहां मौजूद प्राकृतिक बर्फ की आकृति, जिसे ‘अमरनाथ’ कहा जाता था, और इस कठिन पहाड़ी तीर्थ तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का विवरण दिया।
बूटा मलिक की प्रोपोगेंडा वाली कहानी
19वीं सदी में बूटा मलिक से जुड़ी एक कहानी सामने आती है। कथा के अनुसार एक साधु ने चरवाहे बूटा मलिक को कोयले से भरी थैली दी। घर पहुंचने पर कोयला सोने में बदल गया। साधु को खोजते हुए बूटा मलिक उस स्थान तक पहुँचा, जहां उसे अमरनाथ की गुफा और हिमलिंग के दर्शन हुए। कहते हैं कि बूटा मलिक इसकी जानकारी आगे चलकर किसी पंडित को बताता है और फिर अमरनाथ गुफा तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध होने की कहानी कही जाती है।
विडंबना देखिए श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड भी इसे गुफा की ‘Re-discovery’ की Popular story के रूप में दर्ज करता है। जबकि इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं है कि बूटा मलिक ने गुफा की खोज की लेकिन कुछ तथाकथित इतिहासकारों ने बूटा को वास्कोडिगामा जरूर बना दिया। हालांकि पौराणिक ग्रंथों और इतिहासों में अमरनाथ गुफा का सदियों से उल्लेख मिलता है।
वर्तमान में अमरनाथ यात्रा
आज अमरनाथ की पवित्र गुफा तक पहुंचे के दो प्रमुख मार्ग हैं-
पहलगाम मार्ग: चंदनवाड़ी-पिस्सू टॉप-शेषनाग-पंचतरणी होते हुए पवित्र गुफा तक।
बालटाल मार्ग: बालटाल–डोमेल–बराड़ी होते हुए गुफा तक। यह मार्ग छोटा है, लेकिन अधिक खड़ी चढ़ाई वाला है।
श्राइन बोर्ड के अनुसार गुफा पहलगाम से करीब 46 किलोमीटर और बालटाल से करीब 14 किलोमीटर दूर है। यात्रा के प्रबंधन के लिए श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड का गठन 2000 में किया गया था।
अमरनाथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। अमरनाथ के इतिहास को केवल बूटा मलिक की ‘खोज’ से शुरू करना उसके लंबे इतिहास को छोटा कर देता है। ‘अमरेश’ से ‘अमरेश्वर’ तक के उल्लेख, कल्हण के समय के तीर्थयात्री, रानी सूर्यमती के धार्मिक दान और अबुल फ़ज़ल के मुगलकालीन विवरण इस तीर्थ की अलग-अलग ऐतिहासिक परतें सामने रखते हैं। अमरनाथ केवल एक गुफा या वार्षिक यात्रा नहीं, बल्कि कश्मीर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा की ऐसी कड़ी है, जो प्राचीन ग्रंथों से निकलकर आज तक चली आ रही है।