पीओजेके से उठ रही आज़ादी की मांग: भारत से सहायता की पुकार
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। यह कहना कि PojK का हर व्यक्ति भारत में विलय चाहता है, उपलब्ध प्रमाणों से उचित नहीं होगा। आंदोलन के भीतर अलग-अलग राजनीतिक विचार हैं—कुछ लोग अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार चाहते हैं, कुछ पाकिस्तान के शासन से स्वतंत्रता की बात करते हैं और कुछ भारत के साथ संबंध अथवा सहायता की मांग कर रहे हैं।
02-सितंबर-2026
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लालित कौशिक
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर (PoJK) में वर्ष 2026 के दौरान जिस प्रकार असंतोष और विरोध-प्रदर्शन सामने आए हैं, उन्होंने एक बार फिर कश्मीर के उस हिस्से की वास्तविक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। बिजली, महंगाई, रोजगार, खाद्य एवं दवाइयों की उपलब्धता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे पाकिस्तान सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ व्यापक जन असंतोष में बदलता दिखाई दिया। कुछ प्रदर्शनों में आजादी और जनमत-संग्रह के नारे भी सामने आए हैं।
सबसे उल्लेखनीय घटनाक्रम यह रहा कि आंदोलन से जुड़े नेता सरदार अमान खान ने भारत से सहायता की अपील की। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की कार्रवाई के कारण क्षेत्र में खाद्य पदार्थों और दवाइयों की कमी पैदा हुई है और भारत से मानवीय सहायता उपलब्ध कराने तथा जरूरत पड़ने पर LoC के माध्यम से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की मांग की।
आर्थिक परेशानियों से राजनीतिक असंतोष तक
PoK में लोगों की नाराजगी अचानक पैदा नहीं हुई है। लंबे समय से स्थानीय नागरिक बिजली की ऊंची कीमतों, महंगाई, रोजगार की कमी, विकास की धीमी गति और राजनीतिक अधिकारों को लेकर शिकायत करते रहे हैं। 2026 के आंदोलन में इन मुद्दों ने संगठित रूप लिया और Joint Awami Action Committee (JAAC) इसके प्रमुख मंच के रूप में सामने आई।
JAAC की मांगें केवल बिजली या महंगाई तक सीमित नहीं रहीं। उसके 38-सूत्रीय मांग-पत्र में शासन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस व्यवस्था और आर्थिक अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दे शामिल हैं।
यही कारण है कि आंदोलन को केवल आर्थिक आंदोलन मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे स्थानीय लोगों में पाकिस्तान के प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास भी दिखाई देता है।
'आजादी' के नारों ने बदली आंदोलन की प्रकृति
जब किसी क्षेत्र में आर्थिक मांगों के साथ राजनीतिक असंतोष जुड़ जाता है, तो आंदोलन का स्वरूप बदलने लगता है। PoK में भी यही देखने को मिला। विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शनकारियों द्वारा पाकिस्तान-विरोधी नारे लगाए गए और कुछ रैलियों में स्वतंत्रता तथा जनमत-संग्रह की मांग सामने आई।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। यह कहना कि PojK का हर व्यक्ति भारत में विलय चाहता है, उपलब्ध प्रमाणों से उचित नहीं होगा। आंदोलन के भीतर अलग-अलग राजनीतिक विचार हैं—कुछ लोग अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार चाहते हैं, कुछ पाकिस्तान के शासन से स्वतंत्रता की बात करते हैं और कुछ भारत के साथ संबंध अथवा सहायता की मांग कर रहे हैं।
लेकिन भारत से सीधे सहायता मांगना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।
भारत से सहायता की अपील क्यों महत्वपूर्ण है?
सरदार अमान खान द्वारा भारत से सहायता की अपील ने इस पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दी। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने भोजन और दवाइयों की आपूर्ति तथा नागरिकों की आवाजाही के लिए LoC खोलने की मांग तक की।
यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दशकों से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को भारत के खिलाफ एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। लेकिन अब पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्र के एक आंदोलनकारी नेता द्वारा भारत की ओर सहायता के लिए देखना इस बात का संकेत है कि स्थानीय असंतोष की दिशा केवल भारत-विरोध तक सीमित नहीं है।
दूसरे शब्दों में, जिस कश्मीर को पाकिस्तान लंबे समय से भारत के खिलाफ अपनी राजनीति का केंद्र बनाता रहा, उसी क्षेत्र से भारत की ओर सहायता की पुकार सुनाई देना पाकिस्तान के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
आंदोलन के बढ़ने के साथ पाकिस्तान और PoJK प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की। JAAC को प्रतिबंधित किया गया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं। संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और सुरक्षा बलों की तैनाती की खबरें भी सामने आईं।
भारत ने भी PoJK में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित हिंसक कार्रवाई पर पाकिस्तान की आलोचना की। अगस्त 2026 में भारतीय पक्ष ने पाकिस्तान पर नागरिक असंतोष को बलपूर्वक दबाने का आरोप लगाया।
लेकिन पाकिस्तान का तर्क अलग है। वहां की सरकार ने JAAC पर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने के आरोप लगाए हैं। इसलिए घटनाक्रम को समझते समय दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
चुनावों ने भी बढ़ाया तनाव
2026 में PojK में हुए विधानसभा चुनाव भी विवादों से घिरे रहे। JAAC ने चुनावों के बहिष्कार का आह्वान किया, जबकि पाकिस्तान की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव में हिस्सा लिया। चुनाव के शुरुआती चरणों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) ने मजबूत प्रदर्शन किया और बाद में उसके नेता सैयद इफ्तिखार अली गिलानी को क्षेत्र का प्रधानमंत्री चुना गया।
इससे एक दिलचस्प राजनीतिक स्थिति बनी है—एक तरफ संवैधानिक और चुनावी व्यवस्था चल रही है, दूसरी तरफ एक प्रभावशाली नागरिक आंदोलन उस व्यवस्था की वैधता और पाकिस्तान के हस्तक्षेप पर सवाल उठा रहा है।
क्या यह पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती है?
निश्चित रूप से यह पाकिस्तान के लिए केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है। PojK पाकिस्तान की कश्मीर नीति का राजनीतिक आधार रहा है। यदि वहां के नागरिकों में यह धारणा मजबूत होती है कि उन्हें पर्याप्त राजनीतिक अधिकार, आर्थिक अवसर और सम्मान नहीं मिल रहा, तो पाकिस्तान की पूरी कश्मीर नीति पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
विशेष रूप से तब, जब आंदोलनकारी भारत से सहायता मांगने लगें।
हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि PojK में आंदोलन का भविष्य अभी निश्चित नहीं है। हालिया चुनावों में पर्याप्त संख्या में लोगों ने मतदान किया और पाकिस्तान समर्थित राजनीतिक दलों ने चुनावी सफलता हासिल की। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पूरा क्षेत्र पाकिस्तान से अलग होने की दिशा में बढ़ चुका है।
भारत के लिए अवसर और चुनौती
भारत के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक और मानवीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यदि PojK में नागरिकों की वास्तविक समस्या भोजन, दवा और मानवाधिकारों से जुड़ी है तो भारत के सामने अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और मानवीय सिद्धांतों के अनुरूप अपनी भूमिका तय करने का प्रश्न है।
भारत लंबे समय से कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर का वह हिस्सा जो पाकिस्तान के कब्जे में है, भारत का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में वहां से उठने वाली भारत समर्थक या भारत से सहायता की आवाजें भारत के इस राजनीतिक दावे को अंतरराष्ट्रीय बहस में नया संदर्भ दे सकती हैं।
लेकिन भारत के लिए संयम भी उतना ही आवश्यक है। किसी भी आंदोलन को सीधे भारत की राजनीतिक परियोजना का हिस्सा बताने के बजाय स्थानीय लोगों की वास्तविक आवाज और उनकी मांगों को समझना अधिक प्रभावी रणनीति होगी।
PojK में 2026 के घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सवाल फिर सामने खड़ा कर दिया है—क्या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोग वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट हैं?
विरोध-प्रदर्शनों, आर्थिक मांगों, राजनीतिक अधिकारों की आवाज, आजादी और जनमत-संग्रह के नारों तथा भारत से मानवीय सहायता की अपील ने स्पष्ट कर दिया है कि वहां असंतोष गंभीर रूप ले चुका है।
सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि कश्मीर के नाम पर दशकों से राजनीति करने वाले पाकिस्तान के सामने अब अपने ही प्रशासित क्षेत्र में नागरिकों के सवालों का जवाब देने की चुनौती है।
PojK से उठती आवाज केवल बिजली, महंगाई या रोजगार की आवाज नहीं है; यह राजनीतिक सम्मान, अधिकार और भविष्य तय करने की आकांक्षा की आवाज भी है। यदि यह असंतोष आगे भी बढ़ता है और भारत से सहायता की मांग व्यापक होती है, तो इसका असर केवल PojK तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों और पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है।
आने वाला समय यह तय करेगा कि यह आंदोलन केवल अधिकारों और बेहतर शासन तक सीमित रहता है या *“आजादी” की मांग एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप लेती है।*