कश्मीर में वितस्ता नदी के किनारे कभी एक ऐसा मंदिर था, जहां रामनवमी पर धार्मिक अनुष्ठान होते थे, घंटियां बजती थीं, वैदिक मंत्र गूंजते थे और कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु भगवान राम के दर्शन के लिए पहुंचते थे। फिर मंदिर पर अनेकों बार आतंकी हमले हुए, प्रतिमाएं खंडित हुईं, धार्मिक सामग्री को नुकसान पहुंचा, पुस्तकालय जलाया गया और मंदिर वीरान हो गया। जिस परिसर में कभी आस्था और ज्ञान की परंपरा साथ चलती थी, वहां वर्षों तक सन्नाटा पसरा रहा।
यह मंदिर है कश्मीर का श्री रघुनाथ मंदिर... चलिए, जानते हैं श्रीनगर के इस ऐतिहासिक मंदिर का इतिहास, धार्मिक महत्व, हमलों की कहानी और 36 वर्षों बाद हुई धार्मिक अनुष्ठान की वापसी की पूरी कहानी।
रघुनाथ मंदिर का इतिहास
श्रीनगर के फतेह कदल क्षेत्र में झेलम के किनारे स्थित प्राचीन रघुनाथ मंदिर का निर्माण डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने 1835-60 के बीच कराया था। बाद में महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल में मंदिर को अंतिम स्वरुप प्रदान किया और 1875 में यह मंदिर पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। भगवान राम को समर्पित यह मंदिर आगे चलकर कश्मीरी हिंदू समाज के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में शामिल हुआ। कश्मीरी हिन्दू इसे श्री रामचन्द्र जी मंदिर के नाम से पुकारते हैं।
धार्मिक महत्त्व
प्राचीन रघुनाथ मंदिर परिसर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि यहां धार्मिक शिक्षा दी जाती थी, उपनयन संस्कार, सामूहिक विवाह जैसे आयोजन किये जाते थे और यहाँ एक गुरुकुल भी चलता था। मंदिर में कई महत्वपूर्ण प्राचीन धार्मिक ग्रंथ और पांडुलिपियां भी सुरक्षित थीं। यानी यहां सिर्फ दीप और धूप नहीं जलते थे, बल्कि धर्म और ज्ञान की परंपरा भी आगे बढ़ती थी।
रघुनाथ मंदिर कश्मीरी हिन्दुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। चैत्र रामनवमी यहां का प्रमुख पर्व था। दशकों पहले इस अवसर पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते थे। यह मंदिर उस व्यापक कश्मीरी हिंदू परंपरा का हिस्सा था, जिसकी जड़ें घाटी के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में गहरी हैं।
1990 इस्लामिक जिहादियों का हमला
मंदिर के इतिहास का सबसे काला अध्याय 1989 से शुरू होता है। 1989 में रघुनाथ मंदिर पर पहला सबसे बड़ा हमला हुआ। इस्लामिक जिहादियों ने मंदिर के धर्मशाला को आग के हवाले कर दिया। इस हमले में भारी नुकसान हुआ और कुछ श्रद्धालु भी हताहत हुए। आतंकियों ने श्रद्धालुओं को भी हथियार के दम पर पूजा पाठ करने से रोका।
24 फरवरी 1990, मंदिर पर दूसरा बड़ा हमला होता है। इस दौरान मंदिर परिसर में आतंकियों ने गोलीबारी की जिसके निशान दीवारों पर मौजूद हैं। मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई गई और कई प्रतिमाएं खंडित की गई।
13 अप्रैल 1991 और 8 मई 1992 को भी आतंकी मंदिर को अपना निशाना बनाते हैं। इस हमले में भी मंदिर के कई हिस्सों को क्षति पहुंचा, धार्मिक ग्रन्थ जला दिए गए और कुछ ग्रन्थ व पांडुलिपियाँ वितस्ता नदी में बहा दिए गए।
भगवान श्रीराम और माता सीता की प्रतिमाएं खंडित कर झेलम में फेंक दी गईं। यज्ञशाला को बर्बाद किया गया और मंदिर की लाइब्रेरी जला दी गई। मंदिर के आसपास रहने वाले हिंदुओं के सात मकानों को भी निशाना बनाया गया।
हमलों और 1990 के दशक में कश्मीरी हिन्दुओं के बड़े पैमाने पर पलायन के बाद मंदिर की नियमित धार्मिक गतिविधियां लगभग समाप्त हो गईं। तीन दशक से अधिक समय तक मंदिर उपेक्षित और वीरान पड़ा रहा।
मंदिर के रास्ते पर अतिक्रमण और मंदिर के आसपास की संपत्तियों पर स्थानीय मुस्लिमों ने कब्जा कर लिया। कब्जे को लेकर भी शिकायतें सामने आईं। लेकिन तत्कालीन NC और PDP की सरकारों में इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया। झेलम के किनारे स्थित मंदिर का घाट भी जीर्ण अवस्था में पहुंच गया।
2020 में शुरू हुआ पुनरुद्धार
लंबे इंतजार के बाद 2020 में रघुनाथ मंदिर को श्रीनगर के ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के संरक्षण के तहत पुनरुद्धार योजना में शामिल किया गया। श्रीनगर स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत इसके जीर्णोद्धार का काम शुरू हुआ और मंदिर को उसकी ऐतिहासिक वास्तुकला को ध्यान में रखकर संरक्षित करने की योजना बनाई गई। झेलम के घाट के सौंदर्यीकरण को भी इससे जोड़ा गया।
कश्मीरी हिंदू समाज से जुड़े लोगों ने भी मंदिर के पुनर्निर्माण को केवल भवन की मरम्मत नहीं, बल्कि घाटी में सनातन धार्मिक परंपरा की पुनर्बहाली के रूप में देखा। और मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए दान भी दिए।
36 साल बाद गूंजा जय श्री राम
फिर आया 2026, मार्च 2026 में रामनवमी के अवसर पर रघुनाथ मंदिर के द्वार 36 साल बाद श्रद्धालुओं के लिए खुले। मंदिर में हवन और पूजा हुई। कश्मीरी हिंदू श्रद्धालु जम्मू सहित अलग-अलग स्थानों से पहुंचे। स्थानीय मुस्लिम पड़ोसी भी इस अवसर पर शामिल हुए।
मंदिर में पुनरुद्धार का काम अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, फिर भी पूजा रोकने के बजाय परंपरा को फिर शुरू करने का निर्णय लिया गया। लंबे अंतराल के बाद मंदिर में रामनवमी मनाई गई—वही पर्व, जिसकी स्मृति इस मंदिर से दशकों से जुड़ी रही थी।
जम्मू स्थित प्राचीन रघुनाथ मंदिर
कश्मीर के रघुनाथ मंदिर के अलावा जम्मू शहर में भी एक भव्य और प्राचीन रघुनाथ मंदिर है, जो डोगरा काल की ही धार्मिक आस्था और स्थापत्य विरासत की कहानी कहता है। इसका निर्माण महाराजा गुलाब सिंह ने 1835 में ही शुरू कराया और बाद में महाराजा रणवीर सिंह के शासनकाल में बनकर तैयार हुआ।
मंदिर की विशेषता
- मंदिर परिसर में 7 प्रमुख धार्मिक स्थल हैं।
- गर्भगृह में प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की विशाल प्रतिमाएं हैं
- आसपास के कक्षों में रामायण और महाभारत से जुड़े अनेक पात्रों की मूर्तियां स्थापित हैं।
- मंदिर के भीतर स्वर्ण अलंकरण और बाहर से दिखाई देने वाले पांच दिव्य कलश इसकी भव्यता को और उभारते हैं।
- यहां एक ही परिसर में चारों धाम यानी बद्रीनाथ, केदारनाथ, द्वारका और रामेश्वरम के प्रतीकात्मक दर्शन किए जा सकते हैं।
- अलग-अलग कक्षों में सत्यनारायण, सूर्य और बारहमासा से जुड़ी धार्मिक कलाकृतियां मंदिर की आध्यात्मिक और कलात्मक समृद्धि को दर्शाती हैं।
लेकिन भगवान् श्रीराम को समर्पित इस ऐतिहासिक मंदिर ने भी इस्लामिक आतंकवाद का दंश झेला है। नवंबर 2002 में रघुनाथ मंदिर पर आतंकी हमला हुआ था, जिसके बाद सुरक्षा कारणों से मंदिर को कुछ समय के लिए बंद रखना पड़ा।
उपसंहार
रघुनाथ मंदिर की कहानी सिर्फ पत्थरों और दीवारों में दर्ज इतिहास की कहानी नहीं है। यह उस आस्था की कहानी है, जिसने आतंक, पलायन और दशकों की खामोशी के बीच भी अपनी स्मृति को जिंदा रखा। ह
कभी जिन गलियारों में वैदिक मंत्र गूंजते थे, वहां लंबे समय तक सन्नाटा रहा, लेकिन मार्च 2026 में उसी मंदिर में फिर हवन की अग्नि जली, घंटियां बजीं और ‘जय श्री राम’ का जयघोष हुआ।
36 साल बाद लौटी यह आवाज सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान की वापसी नहीं थी। यह उस परंपरा की फिर से सुनाई दी आवाज थी, जिसकी गूंज कभी झेलम के किनारे बसे इस मंदिर की पहचान हुआ करती थी।