नई दिल्ली : जम्मू कश्मीर में जन्माष्टमी के अवसर पर यहां भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे गूंजे, शंखनाद हुआ और कश्मीरी हिंदुओं की पारंपरिक शोभायात्रा आस्था के साथ आगे बढ़ती दिखाई दी। हब्बा कदल के गणपतयार मंदिर से निकली भव्य शोभायात्रा क्रालखुद और बरबरशाह होते हुए लाल चौक के घंटाघर तक पहुंची। भजन, शंखनाद और कृष्ण के जयकारों के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल हुए।
हालाँकि इस आयोजन से भी ख़ास वो स्थान है जहां यह भव्य शोभायात्रा निकाली गई। वो स्थान है लाल चौक... श्रीनगर का लाल चौक जो कभी आतंकवाद, अलगाववाद और जुमे की पत्थरबाजी का सबसे प्रमुख केंद्र हुआ करता था। कभी फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती जैसे कई अलगावादी नेता तिरंगा फहराए जाने को लेकर धमकियाँ देते थे, आज यहाँ इस तरह का आयोजन अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव है...
कश्मीर जुमे की नमाज के बाद होने वाली पत्थरबाजी से लेकर भव्य धार्मिक शोभायात्राओं तक कैसे पहुंचा? आइए, समझते हैं इस बदलाव की पूरी कहानी।
कैसे बदली तस्वीर ?
2014 में सत्ता परिवर्तन होता है, देश में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी विचारधारा की सरकार पूर्ण बहुमत से बनती है। मोदी सरकार की नीति ही आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ होती है। कांग्रेस के शासन काल में जहां यासीन मलिक जैसे आतंकियों और अन्य अलगाववादियों को VVIP ट्रीटमेंट दिया जाता रहा, वहीं BJP के शासनकाल में इन देश विरोधी तत्वों और सीमापार आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का दौर शुरू होता है। इसमें सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और अन्य बड़े ऑपरेशन सबसे बड़ा उदाहरण है।
370 निष्प्रभावी और उसका असर
दूसरा सबसे बड़ा बदलाव हुआ 5 aगस्त 2019 को जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को 370 और 35A की बेड़ियों से आजाद कर लद्दाख और जम्मू कश्मीर को दो अलग अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया। 370 की समाप्ति की बाद जम्मू कश्मीर UT बना और शक्तियां केंद्र के हाथ में आ गईं। यहाँ देश का संविधान पूरी तरह से लागू हुआ, गृह मंत्रालय के नेतृत्व में घुसपैठ, आतंकवाद, अलगाववाद और नशा तस्करों के खिलाफ व्यापक स्तर पर कार्रवाई शुरू हुई।
LG प्रशासन की देखरेख में NIA और दूसरी जांच एजेंसियों ने टेरर फंडिंग, हवाला और आतंक के सपोर्ट नेटवर्क से जुड़े मामलों में लगातार कार्रवाई की। छापेमारी, गिरफ्तारी, संपत्ति की कुर्की और वित्तीय नेटवर्क की जांच के जरिए आतंक को मिलने वाले आर्थिक सहारे पर दबाव बनाया गया। यानी लड़ाई अब सिर्फ बंदूक बनाम बंदूक की नहीं रही आतंक के पूरे इकोसिस्टम को निशाना बनाया गया।
LG प्रशासन में सिस्टम में बैठे देश विरोधी तत्वों पर एक्शन
जम्मू कश्मीर के लिए पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा सिस्टम में बैठे देश विरोधी तत्व थे जो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के इशारों पर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे। बीते 4-5 साल के भीतर LG प्रशासन ने ऐसे 90 से अधिक सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त किया जो आतंकी गतिविधियों में संलिप्त रहे। इससे ना सिर्फ आन्तरिक स्तर पर व्यवस्था को सुधारने में मदद मिली बल्कि पाकिस्तान का भारत विरोधी नैरेटिव भी दम तोड़ता चला गया।
आतंक पर सेना का करारा प्रहार
केंद्र की मोदी सरकार की आतंकवाद के प्रति नीति हमेशा से जीरो टॉलरेंस की रही। इसका नतीजा रहा कि भारतीय सेना ने ऑपरेशन All Out के जरिये घाटी में मौजूद लश्कर और जैश से जुड़े सभी मुख्य कमांडरों को मौत के घाट उतार दिया। आज घाटी में लश्कर या जैश से जुड़े एक भी कमांडर मौजूद नहीं है। आतंक की राह पर जाने वाले या तो पकडे जाते हैं या मुठभेड़ में मार दिए जाते हैं।
ऑपरेशन सिन्दूर भारत की नई रणनीति
2025 में पहलगाम हमले के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर लश्कर और जैश से जुड़े 9 प्रमुख आतंकी ठिकानों को पूरी तरह तबाह कर दिया। इस कार्रवाई में सैंकड़ों की संख्या में आतंकी मारे गए। इसके अलावा जब पाकिस्तानी सेना ने भारत पर पलटवार किया तब सेना ने पाकिस्तान के 11 एयर बेस, 5-6 विमान, कई अन्य सैन्य उपकरणों को पूरी तरह तबाह कर दिया। भारत की इस कार्रवाई ने स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद के खिलाफ अब भारत की युद्ध नीति बदल चुकी है। अब भारत सहेगा नहीं अंदर घुसकर मारेगा और आतंक के पुरे ईकोसिस्टम को नष्ट करेगा।
बहरहाल यह तो हुई बदलाव की बात लेकिन अब आंकड़ों से जानते हैं कितना कुछ बदला है इन तमाम उपायों के बाद......
घाटी में अब अंतिम सांसे गिन रहा आतंक
2014 से पहले आतंक का दौर: गृह मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2009 से 2014 के बीच जम्मू-कश्मीर में 1,939 आतंकी घटनाएं दर्ज हुईं।
370 के बाद बदली तस्वीर: 5 अगस्त 2019 के बाद स्थिति लगातार बदलती चली गई। अगस्त 2019 से 1 अगस्त 2026 तक महज 652 आतंकी घटनाएं दर्ज हुईं। इस दौरान सेना की कार्रवाई में 858 आतंकवादी मारे गए।
आतंकी घटनाओं में गिरावट: 2018 में जम्मू-कश्मीर में 228 आतंकी घटनाएं दर्ज हुई थीं। इसके बाद लगातार कार्रवाई के साथ आतंकवादी हिंसा में कमी आई।
2022 से 2025 तक बड़ा बदलाव: इन वर्षों के दौरान आतंकी घटनाएं 151 से घटकर 35 तक पहुंच गईं।
2023 के बाद उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 44 आतंकी घटनाएं हुईं, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 12 रह गई।
आतंकियों पर लगातार प्रहार: 2020 में सुरक्षा बलों ने 232 आतंकवादी मारे, जबकि 2026 में 5 अगस्त तक 13 आतंकवादी ढेर किए जा चुके थे।
इसी दौरान पत्थरबाजी, जो 2018 में 1,221 घटनाओं तक पहुंच गई थी, 2023 में शून्य दर्ज की गई और अब पत्थरबाजी की घटनाएँ इतिहास के पन्नों में कहीं दफ्न हो गई। हड़तालें भी 2018 की 52 घटनाओं से घटकर अब शून्य हो गईं।
हवाला नेटवर्क और आतंकी फंडिंग से जुड़े मामले में NIA की लगातार छापेमारी ने इस स्थिति आतंकवाद की कमर को काफी हद तक तोड़ दिया है। कश्मीर में आय दिन अलग अलग इलाकों में NIA की छापेमारी में करोड़ों की संपत्तियां जब्त होती है।
यानी जिस सड़क पर कभी पत्थर चलने और दुकानें बंद होने की खबर आती थी, उसी सड़क पर आज धार्मिक शोभायात्राएं निकल रही हैं। और यहीं से कश्मीर की एक दूसरी कहानी शुरू होती है सनातन की वापसी की कहानी।
जम्मू कश्मीर का बजट
केंद्र से मिलने वाली सहायता: 2026–27 में जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के लिए 43290.29 करोड़ का बजट आवंटित हुआ। जो पहले के मुकाबले कहीं अधिक था।
विकास की रफ्तार: सड़कों, सुरंगों, रेलवे, पर्यटन और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स के साथ जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढांचे पर लगातार निवेश बढ़ा है। 2026-27 में भी पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता दी गई है।
मंदिरों में लौटी रौनक
जम्मू कश्मीर में तेजी से बदलते हालात के बाद अब मंदिरों में फिर से रौनक दिखाई दे रही है। तीर्थयात्राओं में बढ़ती भागीदारी इसका बड़ा संकेत है। 2023 में अमरनाथ यात्रा में 4.45 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे थे। 2026 में यह संख्या रिकॉर्ड 4.80 लाख हुई।
खीर भवानी मेला भी इस बदलाव की अपनी कहानी कहता है। 2026 में 9,000 से अधिक कश्मीरी हिंदू श्रद्धालु जम्मू से तुलमुला स्थित माता खीर भवानी मंदिर पहुंचे।
कुपवाड़ा में LOC के करीब तिथवाल में मां शारदा देवी मंदिर का पुनर्निर्माण भी लंबे समय बाद अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की कोशिश का प्रतीक बना।
मचैल माता, शिवखोड़ी और जम्मू के प्राचीन मंदिरों में होने वाले बड़े धार्मिक आयोजन भी इसी बदलते माहौल का हिस्सा हैं। श्री कृष्ण जन्माष्टमी हो या नवरात्रि, या फिर दशहरा कश्मीर के कई प्रमुख इलाकों में भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती हैं।
निष्कर्ष
कश्मीरी हिन्दुओं के लिए यह बदलाव और भी गहरा अर्थ रखता है। आतंकवाद के दौर में विस्थापन ने उनकी सामाजिक और धार्मिक उपस्थिति को घाटी में बुरी तरह प्रभावित किया। ऐसे में श्रीनगर की सड़कों पर फिर से कृष्ण की झांकी निकलना, मंदिरों में आयोजन होना और लाल चौक में शंख-घंटियों की आवाज सुनाई देना केवल किसी एक त्योहार की तस्वीर नहीं है। यह उस सांस्कृतिक स्मृति के फिर से दिखाई देने का संकेत है, जो लंबे समय तक आतंक और भय के बीच दब गई थी। यह कश्मीर में सनातन के पुनर्जागरण का स्पष्ट प्रमाण है।