इतिहास

4 नवंबर 1989, जस्टिस नीलकंठ गंजू की नृशंस हत्या, जब घाटी में शुरू हुआ संगठित और राजनीतिक इस्लामिक आतंकवाद का दंश

     कश्मीर घाटी से हिंदूओं का पलायन कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी। इसकी पटकथा सन 1965 में लिख दी गयी थी जब भारत-पाक युद्ध चल रहा था. यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान को इसमें पूर्ण विजय इसलिए नहीं मिल पाई थी क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था. इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाकिस्तान अधिक्रांत ..

1947- नेहरू के चलते जम्मू-कश्मीर का अधिमिलन खतरे में था, लेकिन सरदार पटेल ने इसको संभव कर दिखाया

 सरदार पटेल के लिए कहा जाता है कि वे जम्मू और कश्मीर का भारत में अधिमिलन नहीं चाहते थे। जबकि दस्तावेजों के अनुसार सरदार पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस रियासत को भारत में शामिल करने की पहल की थी। यही नहीं, उन्होंने अधिमिलन को पुख्ता करने के लिए भी हरसंभव प्रयास किये थे। सरदार ने 3 जुलाई, 1947 को महाराजा हरि सिंह को एक पत्र लिखा और खुद को राज्य का एक ईमानदार मित्र एवं शुभचिंतक बताया। साथ ही महाराजा को आश्वासन दिया कि कश्मीर का हित, किसी भी देरी के बिना, भारतीय संघ और उसकी संविधान सभा में शामिल होने ..

26 अक्तूबर 1947 भारत के साथ जम्मू कश्मीर के अधिमिलन की वास्तविकता और राजनीतिक परिस्तिथियों का सच

   जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो भारत में स्व-शासन आंदोलन तेजी से प्रगति कर रहा था। 12 मई, 1946 को स्टेट ट्रीटीस एवं पैरामाउंट का ज्ञापन कैबिनेट मिशन द्वारा चैंबर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसके बाद, 3 जून, 1947 को माउंटबैटन योजना की घोषणा कर दी गई। इस योजना की एक सलाह यह थी कि 562 रियासतें अपना भविष्य स्वयं तय करने के लिए स्वतंत्र हैं यानी वह भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी एक को स्वीकार कर सकती हैं। अंततः 18 जुलाई, 1947 को यूनाइटेड किंगडम की संसद ने विभाजन ..

22 अक्टूबर 1947, जब पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर आक्रमण कर बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया और वहां के लाखों हिंदू-सिखों का नरसंहार किया

   1947 में जम्मू कश्मीर के भारत अधिमिलन ठीक पहले पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया। इस हमले में पाकिस्तानी सेना के साथ कबाइली सेना ने जम्मू कश्मीर में वो नरसंहार किया। जिसकी बानगी मानव इतिहास में कम ही मिलती है। पाकिस्तानी हमले के जवाब में भारत ने सेना भेजी। लेकिन जिन इलाकों पर पाकिस्तान कब्जा कर चुका था। वहां पाकिस्तानी हमलावरों ने हजारों लोगों का कत्लेआम किया। उन्होनें ना सिर्फ हिंदुओं और सिखों का नरसंहार किया। बल्कि मुस्लिम मस्जिदों तक को कबाइली हमलावरों ने नहीं ..

14 सितंबर, 1989, 30 साल पहले पंडित टीकालाल टपलू की हत्या से शुरू हुआ था घाटी से कश्मीरी हिंदुओं पर अंतहीन उत्पीड़न और नृशंसता

     पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे. पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे. पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया. वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे. उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं. पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में हिन्दू मुसलमान सभी पं टपलू ..

मई 1948, जब जम्मू कश्मीर जल रहा था और पंडित नेहरू मशोबरा-शिमला में माउंटबेटन कपल के साथ छुट्टी मना रहे थे

   6 मई 1948 को पंडित नेहरू ने वेस्ट बंगाल के गवर्नर सी राजगोपालचारी को एक पत्र लिखा। जिसमें पंडित नेहरू ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थतियों की बात करते हुए लिखा- मैं आपको बता नहीं सकता कि आस-पास के हालात के चलते मैं कितना मायूस और खिन्न महसूस कर रहा हूँ। स्थितियों पर काबू पाना मुश्किल है, कई बार वो अपनी गति से चलती हैं। हमारी राजनीति ने नैतिक और असली चरित्र खो दिया है, हम अवसरवादी हो चुके हैं।  पत्र के अंत में नेहरू ने लिखा कि वो 13 मई से 17 मई तक छुट्टी मनाने के लिए शिमला के ..

जम्मू कश्मीर और अन्य राज्यों के साथ कैसे चली संवैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया? #SimplyFacts

   कुछ लेफ्टिस्ट एजेंडा वाले विशेषज्ञ जम्मू कश्मीर के अधिमिलन पर सवाल उठाते हुए दावा करते हैं कि जम्मू कश्मीर के अधिमिलन में देरी हुई जिसके कारण समस्या पैदा हुई। कुछ लोग इसके आधार पर महाराजा को अनिर्णय का दोषी ठहराते हैं। उन्हें यह जान लेना चाहिये कि अनेक राज्यों ने जम्मू कश्मीर के बाद भारत में अधिमिलन किया। त्रिपुरा ने 1949 में अधिमिलन किया। अनेक राज्य इसके भी बाद भारत में शामिल हुए। जम्मू कश्मीर आखिरी राज्य नहीं था। अधिमिलन के लिए अंतिम तिथि निर्धारित नहीं थी। यहां तक कि सिक्किम तो ..

जम्मू कश्मीर संविधान सभा: क्यों बनी, क्या था इसका उद्देश्य? लेफ्टिस्ट प्रोपगैंडा का सटीक जवाब

  बहुत से लोगों के मन में प्रश्न आता है कि केन्द्र से अलग जम्मू कश्मीर के लिये संविधान सभा का गठन क्या केवल जम्मू कश्मीर के लिए ही था। इसके उत्तर के लिए हमें थोड़ा और पीछे जाना होगा। वास्तव में जम्मू कश्मीर के विलय की जो प्रक्रिया है वह बाकी राज्यों की विलय की प्रक्रिया से अलग नहीं थी। कुछ लोग इसे ‘यूनीक’ बताते हैं, बाकियों से अलग बताते हैं, ऐसा नहीं था। अलग परिस्थितियाँ थीं। ऐसी बहुत सारी भीतरी और बाहरी ताकतें थी जो अपनी भूमिका निभा रहीं थीं जिनके कारण अधिमिलन में देरी हुई थी। ..

जानिए 3 अगस्त का खूनी इतिहास- 2001, जब आतंकियों ने 17 बेगुनाह चरवाहों की नृशंस हत्या कर दी थी

     जम्मू कश्मीर में आतंकी हमलों की आशंकाओं और उसकी प्रभाव को समझने के लिए हमें अतीत में झांकना ज़रूरी है। 1990 के बाद आतंकी बेखौफ कश्मीर ही नहीं जम्मू के इलाकों में भी खुलेआम आतंकी वारदात को अंजाम दे रहे थे। 3 अगस्त 2001 की रात ..

1-2 अगस्त, 2000: अमनाथ कैंप, बिहारी मज़दूर बस्ती और डोडा के 2 हिंदू गांवों में हमला कर आतंकियों ने किया था 100 से ज्यादा बेगुनाहों का नरसंहार

 कश्मीर घाटी में आतंकी हमलों की आशंका के चलते एक बार फिर अमरनाथ यात्रा बंद कर दी गयी है। घाटी के इतिहास को जानें तो ये फैसला सही भी लगता है, क्योंकि अमरनाथ यात्रा हमेशा आतंकियों के निशाने पर रही है। आज से ठीक 19 साल पहले 1 और 2 अगस्त, 2000 में आतंकियों ने जम्मू कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में कई हमले कर 24 घंटों के अंदर 100 से ज्यादा बेगुनाह हिंदूओं का नरसंहार कर दिया था। इसमें पहले हमला 1 अगस्त की शाम को पहलगाम अमरनाथ बेस कैंप पर हुआ था, दूसरा हमला अनंतनाग में एक बिहारी मज़दूरों की बस्ती पर हुआ ..

1 अगस्त, 2000, जब पहलगाम के अमरनाथ कैंप पर हुआ था अब तक सबसे बड़ा आतंकी हमला

 कश्मीर घाटी में अमरनाथ यात्रा हमेशा आतंक के साये में रहती है। 1990 के बाद अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमलों में काफी बढ़ोत्तरी आ गयी थी। लेकिन श्री अमरनाथ गुफा के दर्शन की पावन यात्रा पर सबसे बड़ा हमला हुआ था आज से ठीक 19 साल पहले। 1 अगस्त 2000 को 1 जुलाई से शुरु हुई अमरनाथ यात्रा को 1 महीना पूरा हो चुका था। हजारों श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के दर्शन करके अपने घर लौट चुके थे और सैंकड़ों यात्री दर्शन यात्रा करने के लिए पहलगाम और बालटाल कैंप में इंतजार में थे। पहाड़ी और खतरनाक रास्ता होने के कारण ..

श्री पत्थर साहिब - जब पत्थर गुरुनानक देव को छूकर बन गया मोम

  श्री पत्थर साहिब गुरुद्वारा, लेह से पहले 25 किमी पहले श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। इस गुरुद्वारा में एक पत्थर पर गुरुनानक देव जी की छवि छपी हुई है।    इतिहासः गुरु नानक देव जी 1517 ई.पू. में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान सुमेर पहाड़ियों पर अपना धर्म उपदेश देने के बाद नेपाल, सिक्किम और तिब्बत की यात्रा करते हुए यारकंद , लेह के रास्ते इस स्थान पर पहुंचे थे। गुरु नानक देव जहां रूके पर हुए थे उनके विपरीत पहाड़ी में, एक राक्षस रहता था जो लोगों को डराता और हत्या करने के बाद उन्हें ..

27 जुलाई, 1998 की वो काली रात, जब आतंकियों ने 2 गावों के 16 बेगुनाह हिंदूओं की हत्या कर दी थी

21 साल पहले, 1998 में देश के हालात तेजी से बदल रहे थे। बीजेपी तीस से ज्यादा राजनीतिक दलों के साथ केंद्र में सरकार चला रही थी। लेकिन देश राज्य जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या अभी भी ज्यों की त्यों बनी हुई थी। केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर में हालात सुधारने ..

एक असफल देश पाकिस्तान की एक और असफलता कहानी है कारगिल युद्ध, जानिए पाकिस्तान ने इस आत्मघाती दुस्साहस की कोशिश क्यों की...

   कारगिल विजय दिवस को आज 26 जुलाई 2019 को 20 साल पूरे हो चुके है। 3 मई 1999 से शुरू हुआ कारगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 को भारत की विजय के साथ खत्म हुआ। कारगिल युद्ध या कहे ऑपरेशन विजय देश के सैनिकों के वीरता की वो कहानी है जिसके किस्से सुनने के बाद हरेक भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और आखें नम हो जाती है। भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की शुरुआत  आजादी के बाद से ही पाकिस्तानी सेना के पहले जनरल अयूब खान भारत को कमजोर देश समझते थे। इसी कारण सन् 1965 में अयूब खान ने हिम्मत ..

23 से 27 जुलाई, 1946 के बीच नेहरू ने शेख अब्दुल्ला से कई बार मुलाकात की, यहीं से जम्मू कश्मीर में समस्या की शुरुआत हुई

 शेख अब्दुल्ला मई 1946 में श्रीनगर की मस्जिदों का उपयोग साम्प्रदायिक भाषणों के लिए कर रहे थे। धर्म के आधार पर हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों को तैयार किया जा रहा था। महाराजा हरि सिंह ने शेख समझाने और शांतिपूर्वक समाधान के प्रयास किये। जबकि शेख लगातार कट्टर इस्लामिक भाषणों के माध्यम से अपने समर्थकों को पत्थरबाज़ी और उत्पात मचाने के लिए उकसाते रहे। आखिरकार 20 मई, 1946 को राज्य सरकार ने शेख को नजरबंद कर दिया।  इस दिन शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि राज्य में शांति की यह औपचारिक कोशिश महाराजा ..

कारगिल विजय की 20वीं वर्षगांठ : जानिए असाधारण परिस्थितियों लड़े गये युद्ध की अनसुनी दास्तान

  भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 7 जून, 1999 को राष्ट्र के नाम संबोधन दिया। विषय भारतीय सीमा के अन्दर कारगिल में पाकिस्तान सेना की घुसपैठ का था। उन्होंने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए कहा, “कोई भी देश इस तरह के आक्रमण को सहन नहीं करेगा, कम-से-कम हमारी सरकार तो नहीं। हमारे सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान की सेना को पीछे खदेड़ने के लिए बड़ा अभियान शुरू कर दिया है।” प्रधानमंत्री ने सेना पर भरोसा जताया और कहा, “इस अभियान को हमारे जवान समाप्त करेंगे और सुनिश्चित किया जायेगा ..

कारगिल युद्ध - अटल बिहारी बाजपेयी के शान्ति के प्रयास लेकिन पाकिस्तान ने किया कारगिल में धोखा

  भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शांति के प्रयास में पाकिस्तान से एक कदम आगे रखने के लिए तैयार थे। अपने इसी प्रयास में वह 20 फरवरी, 1999 को 22 विशिष्ट सदस्यों के एक दल के साथ एक डीलक्स बस में सवार होकर भारत-पाकिस्तान सीमा पार करके वाघा पह..

18 साल पहले- अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर हुआ आतंकी हमला

 जम्मू कश्मीर में बाबा अमरनाथ यात्रा में जाने वाले श्रद्धालुओं पर हमलों का इतिहास रहा है। सन 1999 में कारगिल युद्ध के बाद अगले ही साल अगस्त सन 2000 में करीब 35 तीर्थयात्री मारे गए थे। उसके बाद का साल 2001 कई मायनों में महत्वपूर्ण था। यह वह साल था जब ..

19 जुलाई 1999- डोडा नरसंहार, जब आतंकवादियों ने पाँच भाइयों के कुनबे को मार डाला था

  बीस साल पहले जब कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी फ़ौज की कमर टूट गई थी और निर्धारित समय सीमा के भीतर उन्हें भारतीय भूमि खाली करने पर मजबूर कर दिया गया था तब आज ही के दिन 19 जुलाई 1999 को जम्मू कश्मीर के डोडा जिले के ठाठरी तहसील में पाँच भाइयों का कु..

18 जुलाई 1950 जयंती विशेष, डोगरा राजवंश के महाप्रतापी राजा प्रताप सिंह की कहानी, जिन्होंने 40 साल के राज में जम्मू कश्मीर को स्वर्ग बना डाला था

  जम्मू में डोगरा राजवंश के संस्थापक महाराजा गुलाब सिंह थे। गुलाब सिंह का राजा के तौर पर राजतिलक महाराजा रणजीत सिंह ने स्वयं किया था। गुलाब सिंह ने अपने राज्य का विस्तार लद्दाख, गिलगित और बल्तीस्तान तक किया। 1846 में कश्मीर घाटा भी इसमें शामिल हो गई। इस प्रकार चर्चित जम्मू-कश्मीर रियासत ने मानचित्र पर अपना स्थान ग्रहण किया, जिसकी सीमाएँ एक ओर तिब्बत और दूसरी ओर अफगानिस्तान व रूस से मिलती थीं। गुलाब सिंह ने अगस्त, 1857 में अंतिम श्वास ली। उनके बाद उनके 26 साल के बेटे राजगद्दी पर बैठे। रणवीर ..

18 जुलाई 1947- भारत स्वाधीनता अधिनियम को ब्रिटिश क्राउन की स्वीकृति और तथ्यात्मक भ्रांतियां

 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ था। लेकिन यह स्वतंत्रता ऐसे ही नहीं दी गई थी। इसके लिए ब्रिटेन की संसद ने ‘India Independence Act’ पास किया था जिसे भारत स्वाधीनता अधिनियम भी कहा जाता है। भारत स्वाधीनता अधिनियम को ब्रिटिश क्राउन की स्व..

17 जुलाई 1927, जयंती विशेष, प्रजा परिषद् आंदोलन के सिपाही और साक्षी रहे वरिष्ठ पत्रकार गोपाल सच्चर के संघर्ष की कहानी

   गोपाल सच्चर जी का जन्म 17.7.1927 को हुआ था। गोपाल सच्चर उन चंद महान शख्सियतों में से एक हैं, जिन्होंने आजादी के बाद पहले राष्ट्रवादी आंदोलन में हिस्सा लिया और उसके साक्षी बने। गोपाल सच्चर जम्मू कश्मीर के जाने-माने पत्रकार रहे हैं। लेकिन उनके संघर्ष की शुरूआत हुई पंडित प्रेमनाथ डोगरा के विश्वस्त सहायक के रूप में। वर्ष 1949 के आरंभ में रघुनाथ पुरा में वरिष्ठ प्रजा परिषद नेताओं के संपर्क में आए। उन्होंने जम्मू में अपने रहने की जगह को छिपने के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया। उन्हें ..

सियाचिन, नेहरू-गाँधी परिवार की राजनैतिक और कूटनीतिक विफलता के इतिहास का उदाहरण

 प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जीवन की दो बड़ी विफलताएं - भारत-पाकिस्तान युद्ध (1947) और भारत-चीन युद्ध (1962) हैं। दोनों ही समय प्रधानमंत्री नेहरू की कमजोर दूरदर्शिता और विफल कूटनीति की साफ झलक दिखाई देती है। इन युद्धों के बाद बनी परिस्थितियों ने भारतीय सैनिकों को सियाचिन ग्लेशियर के 30 डिग्री से कम तापमान वाले मौसम में तैनाती को मजबूर कर दिया। भारतीय जवानों ने वहां शौर्य, जज्बे और दृढ़ता का शानदार प्रदर्शन किया है। इसलिए हमें गौरवान्वित होने का मौका मिला, लेकिन राजनैतिक असफलता का विश्लेषण भी ..

13 जुलाई 1931, वो काला दिन,जहां से जम्मू कश्मीर में इस्लामिक अलगाववाद और पत्थरबाज़ी की शुरूआत हुई

  शेख अब्दुल्ला, श्रीनगर में स्थापित रीडिंग रूम के साथियों के साथ जम्मू कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथ अलगाववाद, आतंकवाद और पत्थरबाज़ी के रूप में एक बड़ी समस्या बना हुआ है। लेकिन लगातार डोगरा रूल के बावजूद 1930 तक जम्मू कश्मीर में हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच कभी झगड़ा देखने को नहीं मिला। इसकी शुरूआत अप्रैल 1930 में हुई और एक साल के अंदर ही इस्लामिक कट्टरपंथ का ये जहर इस कदर बढ़ा कि 13 जुलाई 1931 श्रीनगर में सांप्रदायिक दंगा हुआ, जहां से इस्लामिक सांप्रदायिकता की ऐसी आग फैली जो आज भी ..

13 जुलाई 2002, कासिम नगर नरसंहार- हिंदू बस्ती में लोग नेटवेस्ट ट्रॉफी के फाइनल की कमेंट्री सुन रहे थे, आतंकियों ने अचानक हमला कर 29 मासूमों की हत्या कर डाली

  13 जुलाई 2002 की रात जब लंदन में टीम इंडिया ने इंग्लैंड को हराकर नेटवेस्ट ट्राफी जीती थी, वो रात जम्मू के कासिम नगर में रहने वाले हिंदू परिवारों के लिए खौफनाक रात साबित हुई। जम्मू शहर के बाहरी इलाके में बसी इस कच्ची बस्ती में ज्यादातर मजदूर रहते थे, जोकि हिंदू थे। रात के करीब 8 बजे थे, बिजली चली गयी थी। बस्ती के लोग साथ इकठ्ठा होकर नेटवेस्ट ट्रॉफी फाइनल मैच की रेडिय़ो पर कमेंट्री सुन रहे थे। इसके अलावा आस-पास महिलाएं और बच्चे भी थे। तभी कम से कम 8 आतंकी कथित तौर पर साधुओं जैसा चोला पहनकर ..

12 जुलाई 1989- जब 72 आतंकियों को रिहा करने की सजा जम्मू-कश्मीर को भुगतनी पड़ी थी

किसी भी राज्य में अवांछनीय, आपराधिक और आतंकी तत्व अकारण ही नहीं पनपते। ऐसे तत्वों को शासन द्वारा शह मिलने पर ही लंबे समय तक हिंसक गतिविधियाँ जारी रहती हैं। जम्मू कश्मीर राज्य भी कोई अपवाद नहीं। दुर्भाग्य से यहाँ लंबे समय तक अब्दुल्ला परिवार का शासन रहा औ..

जुलाई 1931, शेख अब्दुल्ला के देशविरोधी और विभाजनकारी राजनीतिक उदय का इतिहास, शेख के अलगाववाद में साथी थे अंग्रेज़ और कांग्रेस

   सर सैयद अहमद खान ने 1875 में मदरसातुल ऊलूम मुसलमान-ए-हिंद के नाम से अलीगढ़ में एक शिक्षा संस्थान खोला, जो कालांतर में अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अरब संस्कृति की पहचान का प्रतीक खजूर का पौधा विश्वविद्यालय के प्रतीक चिह्न के रूप में इस्तेमाल किया गया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद सल्तनत-ए-इंगलिशिया भी चाहने लगी थी कि भारत के मुसलमान भारत की मुख्य सांस्कृतिक धारा से टूटकर अपनी अलग पहचान विकसित करें, ताकि बाद में वक्तबेवक्त उनका अंग्रेजों के हितों ..

20 जुलाई, 1995, पुरानी मंडी, जम्मू बम धमाके में हुई थी 17 हिंदूओं की मौत और 36 घायल, जब अमरनाथ यात्रा को रोकने के लिए किया था बड़ा आतंकी हमला

   26 जनवरी 1995 को गवर्नर केवी कृष्णा राव जम्मू के एम.ए स्टेडियम में गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा ले रहे थे, अचानक 3 बम धमाके पूरे स्टेडियम को दहला देते है। गवर्नर केवी कृष्णाराव तो किसी तरह इस हमले में बच जाते हैं, लेकिन इंफॉर्मेशन डिपार्टेमेंट के 3 अधिकारियों समेत 8 लोग इस हमले में मारे जाते हैं और 45 घायल हो जाते हैं। इससे पता चलता है कि 1995 तक कश्मीर घाटी में फैला इस्लामिक आतंकवाद किस कदर जम्मू क्षेत्र में भी फैल चुका था। दरअसल 1989 के बाद कश्मीर घाटी से करीब ढाई लाख कश्मीरी ..

पंडित टिकालाल टपलू तथा जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या

पृष्ठभूमि:कश्मीर घाटी से पंडितों का पलायन कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी. इसकी पटकथा सन 1965 में लिख दी गयी थी जब भारत-पाक युद्ध चल रहा था. यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान को इसमें पूर्ण विजय इसलिए नहीं मिल पाई थी क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था. इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत कश्मीर में ‘नेशनल ..

30 जून 1990 श्रीनगर, इस्लामिक आतंकियों से बेखौफ़ एक रिटायर्ड बुजुर्ग और उनकी नृशंस हत्या की कहानी #KashmiriHinduExodus

  जून, 1990 तक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और दूसरे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों ने श्रीनगर में एक समानांतर सरकार चलाने की कोशिश शुरू कर दी थी। सैंकड़ों कश्मीरी हिंदूओं की हत्या की जा चुकी थी, पुलिस और प्रशासन इसको रोकने में नाकाम था। फारूख अब्दुल्ला की साजिश के चलते 26 मई 1990 को केंद्र सरकार ने राज्यपाल जगमोहन की हटा दिया था और रॉ चीफ रहे गिरीश चंद्र सक्सेना को राज्यपाल नियुक्त किया गया था। आतंकी कश्मीरी हिंदूओं के घरों पर पोस्टर चिपकाकर, अखबारों में विज्ञापन देकर हिंदूओं को घाटी छोड़ने ..

24 जून, 1990, इस्लामिक आतंकियों और अस्पतालों के साजिश तंत्र की कहानी, जब एक मेधावी छात्र गोलियों से छलनी कर दिया गया, फिर श्रीनगर के अस्पतालों ने भर्ती करने से इंकार कर दिया

1990 के दशक में कश्मीर घाटी में इस्लामिक आतंकी पूरी तरह से कश्मीरी हिंदूओं की जान के पीछे पड़े थे। हिंदूओं को खदेड़ने में आतंकियों का साथ सरकारी संस्थानों में बैठे अधिकारी, कर्मचारी भी खुलकर दे रहे थे। सबको लग रहा है था, कि कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा आना तय है। इसीलिए खौफ से या फिर समर्थन से सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा तबका आतंकियों के साथ था। 25 साल के अश्विनी कुमार गढ़याली, अपने माता-पिता और 2 भाई-बहन के साथ श्रीनगर के छत्ताबल में रहते थे। चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रहा अश्विनी एक मेधावी ..

23 जून 1953, जम्मू कश्मीर में राष्ट्रवादी सत्याग्रह शुरू करने पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ‘राज्य प्रायोजित हत्या’, फिर नेहरू ने इसकी जांच भी न होने दी

  डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए श्रीनगर से कोलकाता 24 जून, 1953 को लाया गया। उस दिन दो लाख से अधिक लोग अपने नेता को श्रद्धाजंली देने एकत्रित हुए। अगले दिन समाचार पत्रों ने पहले पन्ने पर लिखा, “चारो तरफ लोगों की भीड़ मौजूद थी, इससे पहले ऐसा दृश्य 1925 में ‘देशबंधु’ डॉ. चितरंजन दास के निधन के समय देखा गया था। (अमृत बाज़ार पत्रिका, 24 जून, 1953) यह उस दौर के सबसे जनप्रिय नेता और बेहतरीन संसद सदस्य की ‘राज्य प्रायोजित हत्या’ की दु:खद ..

जून 1953, जम्मू कश्मीर- जब लोकतांत्रिक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने करायी राष्ट्रवादी सत्याग्रह की हत्या, नेहरू के पत्रों ने खोला तानाशाही साजिश का राज़

 यह लेख प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा गृह मंत्री कैलाश नाथ काटजू को 26 मई, 1953 और पंजाब के मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर को 28 मई, 1953 को लिखे दो पत्रों पर आधरित है (नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी, जे.एन. - एस.जी. 182)  प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू लोकतंत्र की बातें जरूर करते थे लेकिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लेकर वे हमेशा अलोकतांत्रिक रहे। विपक्ष जैसा कोई शब्द उनके शब्दकोश में नही था। कम से कम भारतीय जनसंघ के 1952-1953 के जम्मू-कश्मीर सत्याग्रह के मामले यह बात साबित हो ..

जून 1953, जम्मू-कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवादी सत्याग्रह की अनसुनी दास्तां, जानिए कैसे गिरफ्तारी के जरिये शेख-नेहरू ने राष्ट्रवाद के खिलाफ खौफ़नाक साजिश रची

भारत में जम्मू-कश्मीर का अधिमिलन 26 अक्टूबर, 1947 को हो चुका था। फिर भी 1952 तक वहां भारतीय संविधान में निहित मौलिक एवं नागरिक अधिकार, वित्तीय एकीकरण, सीमा शुल्क का उन्मूलन, उच्चतम न्यायालय का न्यायिक क्षेत्र, राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां, चुनावों का संचालन और भारत के ध्वज की सर्वोच्चता जैसे प्रावधान लागू नहीं किए जा रहे थे। इसका कारण शेख अब्दुल्ला की जम्मू-कश्मीर को स्वायत्त बनाने की जिद्द थी।  उपरोक्त विषयों पर देश में पहली बार चर्चा दिसंबर 1952 के भारतीय जनसंघ ने अपने कानपुर अधिवेशन ..

20 जून 1949, जब शेख अब्दुल्ला-नेहरू ने मिलकर महाराजा हरि सिंह को जम्मू कश्मीर से निष्कासित करने की चाल चली और युवराज करण सिंह को राज-प्रतिनिधि नियुक्त करवाया #KnowTheHisotryOfJ&K

  अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद और भारतीय रियासतों का देश की नई सांविधानिक व्यवस्था में अधिमिलन हो जाने के बाद महाराजा हरि सिंह इतना तो समझ ही चुके थे कि इतिहास का रथ जिस दिशा में जा रहा है , उसे वापिस नहीं पलटा जा सकता । वैसे तो उन्होंने 1934 से ही रियासत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली प्रारम्भ कर दी थी । राज्य में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई विधान सभा (प्रजा सभा) काम कर रही थी । लेकिन बदली परिस्थितियों में महाराजा को भी जनता का ही प्रतिनिधि होना होगा । महाराजा हरि सिंह ..

माउंटबेटन नहीं चाहते थे जम्मू कश्मीर का भारत के साथ अधिमिलन, जानिए माउंटबेटन और महाराजा हरि सिंह का आपसी टकराव की पूरी कहानी

    विलय या अधिमिलन का अभिप्राय ---    भारत सरकार अधिनियम १९३५ और भारत स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ के पारित हो जाने और भारत/पाकिस्तान डोमीनियन बनने की घोषणा हो जाने के बाद , इतिहास व राजनीति विज्ञान के विद्वानों ने भारतीय रियासतों द्वारा भारत डोमीनियन के संविधान को स्वीकार लेने की घटना को रियासत का भारत में विलय होना ही बताया है । समाज विज्ञान के लेखन में प्राय , फ़लाँ रियासत भारत में शामिल हो गई , जैसे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है । जम्मू कश्मीर को लेकर तो बार बार कहा ..

19 जून, 1952, प्रजा परिषद् नेता प्रेमनाथ डोगरा ने शेख अब्दुल्ला के इस्लामिक अधिनायकवाद के खिलाफ राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से कार्रवाई की मांग की, लेकिन कुछ नहीं हुआ

 जून 1952 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा द्वारा अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किये 56 महीने पूरे हो चुके थे। इस अंतराल में देश की अन्य रियासतों के भारत में शामिल होने की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी, वहीं जम्मू-कश्मीर में यह एकदम ठहर गयी। शेख अब्दुल्ला अपने नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे। उनका ध्यान सिर्फ अधिमिलन को बाधित करने भी बीत रहा था। वे राज्य के लिए अलग संविधान, अलग ध्वज, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों की मांग करने लगे। उनकी प्रशासनिक तानाशाही और साम्प्रदायिक व्यवहार ..

15, जून 1997 का गूल-रामबन नरसंहार- जब इस्लामिक आतंकियों ने खचाखच भरी बस में से बेकसूर कश्मीरी हिंदूओं की पहचानकर नीचे उतारा और निर्मम हत्या की

  साल 1997 तक कश्मीर घाटी से ज्यादातर कश्मीर हिंदू अपना पुश्तैनी घर छोड़कर जम्मू क्षेत्र में बस गये थे। कश्मीरी हिंदूओं ने यहां अपना जीवन नये सिरे से शुरू किया था। लेकिन इस्लामिक जिहादियों ने कश्मीर घाटी से सटे जम्मू के इलाकों में भी कश्मीरी हिंदूओं का निशाना बनाना शुरू कर दिया। 15 जून 1997 गूल नरसंहार इसी का एक दर्दनाक उदाहरण है। 15 जून की सुबह एक यात्री बस रामबन से गूल जा रही थी, जब गूल सिर्फ 7 किमी दूर था। 4 आतंकियों ने बस को रूकवाया, इनमें 2 सेना की वर्दी में थे और 2 पठानी सूट में। चारों ..

14 जून 1952, जब जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की राष्ट्रविरोधी नीतियों के खिलाफ भारतीय जनसंघ ने शुरू किया राष्ट्रवादी आंदोलन का आगाज़

 जवाहरलाल नेहरू ने भारत के प्रधानमंत्री के नाते 15 अप्रैल, 1952 को शपथ लेते हुए कहा, “वे विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे।” साथ ही देश की पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया ने भारत की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने का भी वायदा किया। इस प्रतिज्ञा के दो आयाम थे, एक भारत की तकदीर का फैसला नेहरू के हाथों में आ गया। दूसरा, पिछली दो शताब्दियों में ब्रिटिश साम्प्रदायिकता और विभाजनकारी दंश से देश को उबारने की जिम्मेदारी। यह हमारा दुर्भाग्य ही ..

तथ्यों के आधार पर समझिए, कैसे हुई जम्मू कश्मीर में परिसीमन के नाम पर जम्मू और लद्धाख के साथ धोखाधड़ी

हमारा इतिहास, हमारा वर्तमान तय करता है और वर्तमान भविष्य को गढ़ता है I जम्मू कश्मीर में 1947 के बाद का इतिहास तत्कालीन राजनेताओं द्वारा धोखे और छल से लिखा गया है I राज्य का परिसीमन भी इस छल कपट से अछूता नहीं रहा I इस लेख में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार त..

6 जून 1949 – नेहरू और कांग्रेस ने महाराजा हरि सिंह की सुनी होती, तो अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का कभी हिस्सा न बनता

जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरु की जुगलबंदी ने जम्मू कश्मीर को एक ऐसी अंधी खाई में धकेल दिया, जिसका परिणाम हम आज अलगाववाद और आतंकवाद के रूप में देखते है. 1947 में जब देश आजाद हुआ तो देसी रियासतों के सामने दो विकल्प थे, या तो वो पाकिस्तानी..

माउंटबेटन ने जून, 1947 में लागू किया था भारत के बंटवारे का प्लान, जानिए कैसे होना था देशी रियासतों और ब्रिटिश रूल्ड स्टेट्स का बंटवारा

 3 जून 1947 एक ऐसी तिथि है जिसने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया था . इस तिथि को माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का प्लान घोषित किया था. 15 अगस्त 1947 के दिन भारत आजाद हुआ लेकिन आज़ादी के साथ-साथ इस दिन से ठीक एक दिन पहले भारत का एक एक हिस्सा भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना था. भारत के विभाजन और 15 अगस्त पर बहुत कुछ लिखा गया लेकिन इस विभाजन की दास्ताँ 3 जून 1947 को ही लिख दी गयी थी. 1947 में भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष अंतिम चरण में था. भारत का भविष्य क्या होगा इस पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे. ..

3 जून 1947, जब भारत के बंटवारे की आधिकारिक - घोषणा की गई ।

  3 जून 1947 एक ऐसी तिथि है जिसने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया था . इस तिथि को माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का का प्लान घोषित किया था. 15 अगस्त 1947 के दिन भारत आजाद हुआ लेकिन आज़ादी के साथ -२ इस दिन से ठीक एक दिन पहले भारत का एक ए हिस्सा भारत से ..

बलिदान दिवस: 5वें सिख गुरु अर्जन देव जी के बलिदान दिया, लेकिन मुगल जहांगीर से समझौता नहीं किया, यहीं से सिखों में शहीदी परंपरा प्रारंभ हुई, जिसको मुगल कभी झुका नहीं सके

 गुरू अर्जन देव जी सिखों के पांचवें गुरू थे जिनका जन्म 15 अप्रैल 1563 को गोइंदवाल साहिब में हुआ था। गुरू अर्जन देव जी गुरू रामदास जी तथा माता भानी जी के सुपुत्र थे। गुरू अर्जन देव जी को 18 साल की उम्र में सन 1581 में गुरगद्धी प्राप्त हुई। गुरू साहेब ने 1588 में हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य शुरू करवाया। गुरू अर्जन देव जी ने आदि ग्रंथ (श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी) के संकलन का कार्य भी भाई गुरदास जी से कराया जो की 31 जुलाई 1604 को संपूर्ण हुआ। दसवंध निकालने की प्रथा भी गुरू जी ने ही शुरू की थी। इसके ..

जानिए, कांग्रेस ने कैसे वीर सावरकर और सुभाष चंद्र बोस को आतंकवादी घोषित करने की शर्मनाक कोशिश की, इतिहास में हर मौके पर महान क्रांतिकारियों को अपमानित किया

 लोकसभा में 17 नवम्बर, 1972 को एक संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हो रही थी। उस दिन अंडमान और निकोबार द्वीप का नाम बदलकर ‘शहीद और स्वराज द्वीप’ किया जाना प्रस्तावित था। चर्चा के दौरान कांग्रेस (आई) के सांसद, राम गोपाल रेड्डी ने सुभाष चन्द्र बोस, श्री अरविन्द और विनायक दामोदर सावरकर को ‘आतंकवादी’ कहकर संबोधित किया। जब इसका विरोध हुआ तो रेड्डी ने कहा कि मुझे यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने शर्मसार करने वाले इस शब्द पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी। ..

शेख अब्दुल्ला ने नेहरू को दर्ज़नों बार धोखा दिया, फिर आखिर क्या मज़बूरी थी कि जम्मू कश्मीर के मामले में नेहरू शेख पर हर बार भरोसा करते रहे और कश्मीर का सुलगने दिया?

अप्रैल 1964 में जेल से निकलने के बाद शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने दिल्ली पहुंचे। दोनों की यह आखिरी मुलाकात 11 सालों के अंतराल के बाद हो रही थी। शेख जब पालम हवाईअड्डे पहुंचे तो वहां उनके स्वागत में इंदिरा गाँधी मौजूद थी। वे सभी सीधे तीन मूर्ति भवन पहुंचे। नेहरू उन दिनों गंभीर रूप से बीमार थे। इस लम्बी चर्चा के निष्कर्ष में शेख को पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए प्राधिकृत किया गया। यह प्रधानमंत्री का एक व्यक्तिगत निर्णय था, जिसके लिए उन्होंने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से पूछना जरूरी नहीं समझा। ..

21 मई, 1990 को पाकिस्तानी आतंकियों ने की थी मीरवाइज़ उमर फारूख के पिता की हत्या, लेकिन 20 साल बाद अभी भी पाकिस्तान की भाषा क्यों बोलता है उमर फारूख, जानिए इस साजिश की पूरी कहानी

श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके के अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुख के पिता मीरवाइज मौलाना फारुख शाह की 21 मई, 1990 के दिन पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद अयूब डार ने गोली मार कर हत्या कर दी थी . लेकिन आज 29 साल के बाद उसी युसूफ शाह का बेटा जम्मू कश्मीर के विषय पर पाकिस्तान से बात करने की तरफदारी कर रहा है। मीरवाईज उमर फारुख अपने पिता की मौत का सिर्फ राजनितिक दुरूपयोग करता है अन्यथा डाउन टाउन (श्रीनगर का वो इलाका जहा मीरवाईज उमर फारुख) रहता है। वहां का बच्चा -बच्चा जानता है कि उसके पिता को मारने में किसका हाथ ..

20 मई 1990, टीचर चमन लाल पंडिता को मुस्लिम पड़ोसियों ने वायदा किया- “घाटी छोड़कर मत जाओ, सब मिलकर रक्षा करेंगे”, लेकिन जब आतंकी आये किसी ने साथ नहीं दिया

 (Representative Image)  मई 1990 तक कश्मीर घाटी में इस्लामिक आतंकवाद अपने चरम पर था, हिंदू घाटी छोड़ रहे थे। बड़गाम जिले के कवूसा खालीसा गांव के चमन लाल पंडित ने भी परिवार समेत घाटी छोड़ने का मन बनाया। लेकिन बरसों तक साथ रहे मुस्लिम पड़ोसियों ने मिलकर चमन लाल से गांव छोड़कर न जाने को कहा। सबने वायदा किया कि वो उसको कुछ नहीं होने देंगे। कुछ ने तो यहां तक कहा कि वो अपने बच्चे कुर्बान कर देंगे, लेकिन चमन लाल के परिवार पर आंच नहीं आने देंगे। चमन लाल ने घाटी छोड़ने का मन बदल दिया।   लेक..

19 मई, 1990, 27 साल के दिलीप कुमार को इस्लामिक आतंकियों ने 12 गोलियां मारी, फिर पेड़ पर लटकाकर छाती में चेतावनी पत्र ठोंककर लिखा, ‘हिम्मत है, तो लाश उतारो और एक लाख पाओ’

  मई, 1990 में कश्मीर घाटी में हिंदूओं को इस्लामिक आतंकी चुन-चुन कर निशाना बनाना शुरू कर चुके थे। कई जानी-मानी हिंदू हस्तियों की हत्या कर दी गयी थी। इस्लामिक आतंकी हिंदूओं को घाटी छोड़ने की धमकी दे रहे थे। शोपियां जिले के मुजामार्ग गांव में 27 साल का दिलीप कुमार अपने 3 छोटे भाईयों और मां के साथ रहता था। पिता की मृत्यू हो चुकी थी। घर की देखभाल का पूरा दारोमदार दिलीप के कंधों पर था। दिलीप बेरोजगार था, लेकिन पुश्तैनी जमीन के सहारे घर चल रहा था। दिलीप को भी घाटी छोड़ने की धमकियां दी गयीं, लेकिन ..

कश्मीरी हिंदूओं के नरसंहार का इतिहास, 18 मई, जब इस्लामिक आतंकियों ने एक नौजवान और एक पुलिस ऑफिसर की नृशंस हत्या कर दी थी

(Representative Image)  18 मई 1990, बात कश्मीर घाटी की है, घाटी में हिंदूओं पर हमले तेज़ हो चुके थे। हिंदू परिवार घाटी छोड़कर जम्मू बसना शुरू हो गये थे। बारामूला जिले काज़ीहामा इलाके में 26 साल का मनमोहन बचलू का परिवार पेशोपेश में था कि घाटी छोड़ें या अपने पुरखों की जमीन पर ही इस्लामिक आतंकियों का मुकाबला करें। परिवार में 67 साल के पिता, 56 साल की माता और 19, 23 और 25 साल की बहन थी। मनमोहन करनाह के पोस्टल डिपार्टमेंट में पोस्टल असिस्टेंट पद पर तैनात था। मई महीने में जब वो छुट्टी के लिए घर ..

'भारतीय संविधान के अंतर्गत देश के 4 करोड़ मुसलमान खुश रह सकते हैं, तो जम्मू कश्मीर के 25 लाख मुसलमान क्यों नहीं"- डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी

जम्मू कश्मीर का इतिहास डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुकर्जी के बिना हमेशा अधूरा रहेगा. जब भी जम्मू कश्मीर राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चिंतन - मनन करता किया जाता है तो वह चौंका देता है। जम्मू कश्मीर में स्वतंत्र भारत का पहला आंदोलन हुआ जिसे प्रजा परिषद आंदोलन के नाम से जाना जाता है। यह आंदोलन देश भर के अध्येताओं और विशेषकर इतिहास, राजनीति विज्ञान या कानून के अध्येताओं के लिए रुचिकर साबित हो सकता है।..

गिरिजा टिक्कू – एक कश्मीरी टीचर जिसे आतंकियों ने जीवित ही आरे से काट दिया था

 अवार्ड वापसी गैंग इसके खिलाफ कभी नहीं बोला न अवार्ड वापिस किये    14 फ़रवरी 2019 का दिन भारत के इतिहास का एक काला अध्याय के रूप में रहेगा . इस दिन पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने एक आत्मघाती हमला कर सीआरपीऍफ़ की एक पूरी बस उड़ा दी,हमले में 50 से ज्यादा जवान वीरगति को प्राप्त हुये. पूरे देश में हल्ला मचा . बड़े -2 लेख लिखे गए .भारत सरकार पर दबाव बना कि पाक्सितान को सबक सिखाया जाए और परिणाम बालाकोट एयर स्ट्राइक .जो लोग जम्मू कश्मीर को जानते और समझते है वो इस बात को जरुर समझेंगे ..

15 मई, 1993 फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा की पुण्यतिथि विशेष – भारतीय सेना का अफसर जो पाकिस्तानी तानाशाह अयूब खान भी का बॉस भी रह चुका था

    फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा का पूरा नाम था, कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा। एक ऐसा नाम है जिसका ज़िक्र किये बिना भारतीय सेना का इतिहास अधूरा है I करिअप्पा ने सेकेण्ड लेफ्टिनेंट के पद से सेना में अपना सफ़र शुरू किया I 1947 में उन्होंने जम्मू कश्मीर में भारत –पाकिस्तान युद्ध के दौरान पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया किया था । 15 जनवरी 1949 को उन्हें भारतीय सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी उपलक्ष्य में 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है I 1953 में करिअप्पा ..

ऐसा कोई न सगा जिसे पाकिस्तान ने न ठगा – भाग -2

इस्कंदर मिर्ज़ा – पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिसके जनाज़े में सिर्फ तीन पाकिस्तानी थे   पाकिस्तान एक असफल प्रयोग था। आज से नहीं जब से आस्तित्व में आया तब से। जिन लोगों ने पाकिस्तान का सपना देखा सबसे पहले उन्ही को पाकिस्तान से बाहर किया गया । जिन्ना तो पाकिस्तान बनने के बाद यह दुनिया छोड़ गया था, लेकिन उसकी बहन फातिमा जिन्ना की भी रहस्यम परिस्थितियों में मौत हो गयी । कुछ लोग कह्ते है उसकी हत्या हुई थी, उसकी चर्चा फिर कभी। आज हम आपको बताएँगे एक ऐसे नाम के बारे में जो पाकिस्तान ..

आज ही के दिन 2002 में पाकिस्तानी आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर में सेना के जवानों सहित 31 नागरिकों की हत्या कर दी थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान को सबक सिखाया

  कारगिल युद्ध के 17 महीनों के अन्दर ही भारत और पाकिस्तान फिर से आमने-सामने थे। यह गंभीर और नाजुक हालात संसद पर आतंकी हमलें ने पैदा कर दिए थे। इस बीच 14 मई, 2002 को जम्मू-कश्मीर के कालूचक में पाकिस्तानी आतंकियों ने 31 लोगों की हत्या कर दी। उस दौरान विदेश मंत्री रहे जसवंत सिंह अपनी किताब ‘ए कॉल टू ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ इमर्जेंट इंडिया’ में लिखते हैं, “कालूचक घटना एक आखिरी तिनके की तरह थी जिसने भारत और पाकिस्तान को युद्ध के एकदम नजदीक ला दिया था।” लोकसभा में गृह मंत्री, ..

मई 1953, जब डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर में राष्ट्रवादी आंदोलन की मशाल

 स्वतंत्रता प्राप्ति के के बाद, भारत में सबसे पहला बड़ा जनांदोलन था प्रजा परिषद् आंदोलन I इस आंदोलन की शुरुआत जम्मू में शेख अब्दुल्ला द्वारा फैलाई गयी अराजकता के खिलाफ हुई I आंदोलनकारियों की सीधी माँग थी कि भारत का पूरा संविधान पूरे जम्मू कश्मीर में लागू किया जाये I इस आंदोलन को पूरे राज्य की पहचान बनाने में सबसे बड़ी भूमिका श्री प्रेमनाथ डोगरा की थी और इसे पूरे देश में फैलाने का श्रेय श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी को जाता है I श्री मुखर्जी ने इस जन आंदोलन को सारे देश में राष्ट्रवादी पहचान दी I ..

मई, 1990 की वो शाम जब इस्लामिक आतंकियों ने प्रोफेसर के.एल. गंजू की हत्या की नृशंस हत्या की और पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार कर तड़पाकर मारा

  मई 1990, कश्मीर घाटी। कश्मीरी हिंदूओं पर हमले तेज़ हो गये थे। हिंदूओं के ने धीरे-धीरे अपनी पुरखों की जमीन छोड़कर घाटी से बाहर बसना शुरू कर दिया था। लेकिन बहुतेरे ऐसे थे, जिन्हें अपने सदियों से साथ रह रहे मुस्लिम पड़ोसियों पर खुद से ज्यादा भरोसा था। ऐसे ही एक शख्स थे सोपोर में एग्रीकल्चरल कॉलेज में प्रोफेसर के. एल. गंजू। देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में वो एक जाने-माने रिसर्चर माने जाते थे। उनके परिवार को कई बार धमकियां मिली, रिश्तेदारों ने घाटी छोड़ने की सलाह दी। लेकिन केएल गंजू ने इंकार ..

10 मई, 1857 विशेष: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनकहे तथ्य और भ्रांतियों की पड़ताल

   -बृजेश द्विवेदी 1857 का वो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम साल 1850 के आते आते ईस्ट इंडिया कंपनी का देश के बड़े हिस्से पर कब्जा हो चुका था। जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारतीय जनता के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष फैलता गया। प्लासी के युद्ध के एक सौ साल बाद ब्रिटिश राज के दमनकारी और अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ असंतोष एक क्रांति के रूप में भड़कने लगा, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम ..

1857, स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने बनाया था मुस्लिम तुष्टिकरण और सांप्रदायिकता भड़काने का प्लान, जिसके नतीज़े में बना पाकिस्तान

स्वतंत्रता संग्राम की व्यापकता, तीव्रता और असरडलहौजी ने भारत से जाने के बाद, अगले दिन (29 फरवरी, 1956) ही विक्टोरिया को एक पत्र लिखा. उसने अपनी महारानी को बताया कि भारत में शांति कब तक बनी रहेगी, इसका कोई भी सही आंकलन नहीं कर सकता. उस पत्र में आगे लिखा कि इसमें कोई छिपाव नहीं है कि किसी भी समय संकट उठ खड़ा हो सकता है. भारत का अगला गवर्नर-जनरल कैनिंग बना और उसने भी डलहौजी के मत की पुष्टि की.[i] इस चिट्ठी के एक साल के अन्दर ही भारत का स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया. इससे एक बात तो पक्की हो गयी कि संग्राम ..

जानिए डॉली मोहिउद्दीन की दर्दनाक कहानी, जिसका 1990 में जेकेएलएफ आतंकियों ने 2 दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया और फिर नृशंस हत्या कर दी

  1990 के दशक में कश्मीर घाटी में सिर्फ कश्मीरी हिंदू ही इस्लामिक जिहादियों के शिकार नहीं बने। उनके निशाने पर वो आम मुसलमान भी थे, जिसने कश्मीरी पंडितों के साथ थोड़ी भी हमदर्दी दिखाने की जुर्रत की थी। 1989 में कश्मीर की आज़ादी के नाम पर मुजाहिदीन आतंकियों ने कश्मीरी हिंदूओं को काफिर बताकर मारना शुरू कर दिया था। इसको लेकर कईं मुस्लिम परिवारों ने विरोध किया, तो मुजाहिदीन आतंकियों ने उनको भी “मुनाफिकुन” करार देकर मारना शुरू कर दिया गया, उस घर की औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किया ..

#RememberingOurHeroes जन्म- 5 मई, 1936, सर्वोच्च भारतीय सैनिक सम्मान परमवीर चक्र के विजेता मेजर होशियार सिंह की कहानी, जो कुशल नेतृत्व, असाधारण युद्ध कौशल, अदम्य साहस, शोर्य के प्रतीक थे

  जन्म - 5 मई सन 1936 ई. सिसान, रोहतक, हरियाणा. देहावसान - 6 दिसंबर सन 1998 ई. भारत-पाकिस्तान युद्ध सन 1971 के दौरान 15 दिसम्बर को गोलन्दाज फौज की तीसरी बटालियन, जिसका नेतृत्व मेजर होशियार सिंह कर रहे थे, को आदेश दिया गया कि वह शंकरगढ़ सेक्टर में बसन्तार नदी के पार अपनी पोजीशन जमा लें, वह पाकिस्तान का अति सुरक्षित सैनिक ठिकाना था और उसमें पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या भी अधिक थी, यानी दुश्मन यहां अधिक मजबूत स्थिति में था. फिर भी आदेश मिलते ही इनकी बटालियन दुश्मनों पर टूट पड़ी. किन्तु मीडियम ..

1964 में तमाम दल आर्टिकल 370 को हटाने के लिए एकजुट थे, लेकिन कांग्रेस ने पाकिस्तान और शेख अब्दुल्ला धमकियों के चलते विधेयक पास नहीं होने दिया

पार्ट-2 भारतीय जनसंघ के सांसद यू.एम. त्रिवेदी 13 मई, 1964 को किसी प्रस्ताव पर लोकसभा में बोल रहे थे। हालाँकि यह प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर पर नहीं था फिर भी चर्चा में उन्होंने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का मुद्दा उठा दिया। त्रिवेदी ने जोर देते हुए कहा, “अनुच्छेद 370 को समाप्त करने में क्या अड़चन आ रही है?” यहाँ से उस दौर का सूत्रपात हुआ जब अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए विपक्ष एकमत था। इस सम्बन्ध में लोकसभा में शानदार भाषण दिए गए। इतिहास का सही ज्ञान और तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया गया। ..

30 अप्रैल, 1990, जब इस्लामिक आतंकियों ने सेकुलरिज़्म की मिसाल सर्वानन्द कौल ‘प्रेमी’ की पुत्र समेत नृशंस हत्या की, इसके बाद कश्मीरी हिंदूओं का नरसंहार कश्मीर में कभी नहीं रूका

सर्वानन्द कौल उनमें से थे जिन्होंने सेकुलरिज्म को अपना धर्म समझा था. सर्वानन्द कौल के ऊपर माता रूप भवानी की कृपा थी जिसने उन्हें कश्मीरी संतों की जीवनी लिखने को प्रेरित किया था. एक कवि, अनुवादक और लेखक के रूप में उनकी ख्याति ऐसी थी कि मशहूर कश्मीरी शायर महजूर ने उन्हें ‘प्रेमी’ उपनाम दिया था. सर्वानन्द ने टैगोर की गीतांजली और गीता का तीन भाषाओँ में अनुवाद किया था: हिंदी, उर्दू और कश्मीरी. हिंदी में एम् ए की डिग्री रखने वाले सर्वानन्द कौल कुल छः भाषाओँ के ज्ञाता थे- संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी, ..

साल 1964 में अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए हुए थे कई प्रयास, जम्मू कश्मीर सहित देश के दर्जनों सांसदों ने लोकसभा में एकमत से उठायी थी आवाज़

Part 1भारतीय राजनीति में साल 1964 को दो महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए याद किया जा सकता हैं। पहला, इस एक ही साल में देश ने तीन प्रधानमंत्री देखे। जवाहरलाल नेहरू के निधन (27 मई) के बाद गुलजारी लाल नंदा (कार्यकारी) और फिर लाल बहादुर शास्त्री ने देश का नेतृत्व संभाला। दूसरा, लोकसभा में अनुच्छेद 370 को संविधान से समाप्त करने के लिए एकसाथ कई प्रस्ताव आने शुरू हुए। इससे पहले अनुच्छेद 370 का प्रमुखता से जिक्र 7 अगस्त, 1952 को लोकसभा में आया था। इसके बाद सामान्यतः ऐसा कोई अवसर नहीं आया। नेहरू के 17 सालों के ..

दुर्भाग्य से हिन्दू : जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू के लिए अक्सर कहा जाता हैं कि वे शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और दुर्भाग्य से हिन्दू थे। दरअसल यह हिन्दू महासभा के बी.एस. मुंजे ने नेहरू के लिए कहा था। हालाँकि, कई इतिहासकारों और लेखकों ने मुंजे के इस कथन का समर्थन किया हैं। बी.आर. नंदा अपनी पुस्तक ‘गोखले, गाँधी और नेहरू’ में लिखते हैं, “उन्होंने कभी नहीं छुपाया कि उन्हें धर्म से नफरत हैं।” इसका एक उदाहरण साल 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में मिलता हैं। अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू हिन्दू धर्म में पैदा होने का जिक्र करते ..

13 अप्रैल, 1984- जब भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन पर फहराया था तिरंगा

13 अप्रैल, 1984- जब भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र सियाचिन पर तहराया था तिरंगा ..

13 अप्रैल 1919, जलियांवाला बाग नरसंहार: जब कांग्रेस ने अंग्रेजों से जवाब मांगने के बजाय सिर्फ अपनी राजनीति चमकायी

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3 दशकों में इन राष्ट्रवादी नेताओं ने जान गंवाई, लेकिन किश्तवाड़, डोडा और भदरवाह में इस्लामिक आतंकियों के पैर नहीं जमने दिये

3 दशकों में इन राष्ट्रवादी नेताओं ने जान गंवाई, लेकिन किश्तवाड़, डोडा और भदरवाह में इस्लामिक आतंकियों के पैर नहीं जमने दिये ..

सरदार पटेल नहीं चाहते थे आर्टिकल 370, लेकिन शेख अब्दुल्ला की ज़िद पर नेहरू ने संविधान सभा में ऐसे पास कराया विघटनकारी अनुच्छेद

 आईसीएस अधिकारी रहे वी. शंकर अपनी किताब ‘माय रेमिनिसेंस ऑफ़ सरदार पटेल’ में लिखते है कि संविधान सभा की सामान्य छवि को सबसे ज्यादा खतरा उस प्रस्ताव से हुआ जो जम्मू-कश्मीर से संबंधित था। इसके जिम्मेदार वे शेख अब्दुल्ला को बताते है। शंकर आगे लिखते है कि शेख जब जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने लगे तो गोपालस्वामी आयंगर ने जवाहरलाल नेहरू से इस पर विस्तार से चर्चा की। इसके बाद एक मसौदा तैयार किया गया जिसे भारत की संविधान सभा के समक्ष कांग्रेस द्वारा रखा गया। यह ..

जिस आर्टिकल 370 को हटाने के लिए राममनोहर लोहिया ने संसद आवाज़ उठायी थी, आज लोहिया के कथित चेले उसी 370 का गुणगान करते नज़र आते हैं

बात 1964 की हैं जब केंद्र में नेहरू की सरकार थी, जम्मू कश्मीर की समस्या विकराल होती जा रही थी। राष्ट्रवादी, समाजवादी..यहां तक कि कांग्रेसी नेता भी जम्मू कश्मीर की समस्या का स्थायी निदान करने के लिए आर्टिकल 370 को हटाने के लिए आवाज़ उठा रहे थे। इनमें एक प्रमुख और दमदार आवाज़ थी समाजवादी राममनोहर लोहिया की।1964 में ही लोकसभा में बिजनौर से निर्दलीय सांसद श्री प्रकाश वीर शास्त्री अनुच्छेद 370 हटाने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल लेकर आये थे । इस बिल के समर्थन में श्री एच एन मुखर्जी, श्री सरजू पांडेय, श्रीमधु ..